Thursday, 10 September 2015

न्यायिक स्वतंत्रता ...

न्यायिक स्वतंत्रता ...
भारत के संविधान के अनुच्छेद  50 में कहा गया है कि राज्य की लोक सेवाओं में , न्यायपालिका को  कार्यपालिका से  पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा | किन्तु 68 वर्ष की आजादी में इस दिशा में क्या प्रगति हुई है चिंतन का विषय है|
देश में 70 प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर है तथा कृषि भूमि ही उनकी मुख्य सम्पति है और कृषि भूमि के विवादों के निपटान के लिए राजस्व न्यायालय हैं जिन पर न्यायपालिका का नियंत्रण न होकर राज्य सरकरों का नियंत्रण है| इसके अतिरिक्त सेवा, कर, श्रम, स्टाम्प, उपभोक्ता, सूचना, सहकारिता  आदि बहुत से मामलों के लिए विशेष न्यायाधिकरण कार्यरत हैं जिनमें विभागीय अधिकारी ही निर्णय करते हैं  और ये सरकारों के नियंत्रण में ही कार्य करते हैं | वास्तव में देखा जाये तो देश की न्यायपालिका के पास तो मात्र 10% न्यायिक कार्य ही है शेष तो आज भी कार्यपालकों द्वारा  इन अधिकरणों में ही निपटाया जाता है | अधिकरण स्थापित करने का मूल उद्देश्य जनता को शीघ्र और सस्ता न्याय दिलाना बताया जाता है किन्तु फिर भी इनमें कितना विलम्ब होता है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है| इतना ही नहीं सरकारों द्वारा आये दिन स्थापित किये जाने  वाले इन नए नए अधिकरणों से न्यायपालिका का क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि जिस विषय को आज तक न्यायपालिका सुन रही थी वही विषय इन अधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आ रहे हैं और न्यायपालिका अब इन मामलों की  सुनवाई नहीं कर सकती |

क्या सरकार के ये कदम संविधान के सर्वथा प्रतिकूल नहीं हैं ?

Tuesday, 17 February 2015

कौनसा न्याय ? कैसा न्याय .....? किसका न्याय...?

जिस व्यक्ति का भारत के न्यायालयों से कोई वास्ता नहीं पडा हो उनके लिए वे बहुत सम्मानजनक स्थान रखते हैं | मेरे मन में भी कुछ ऐसा ही भ्रम था किन्तु लगभग 20 आपराधिक और सिविल मामले सरकारी अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के विरूद्ध देश के विभिन्न स्तर के न्यायालयों में दायर करने के बाद मेरा यह भ्रम टूट गया | इनमें से ज्यादातर का प्रारम्भिक स्तर पर ही असामयिक अंत कर दिया गया ...न्याय एक में भी नहीं मिला | सरकारी पक्ष के विषय में न्यायालयों की यह अवधारणा पायी गयी कि  वह ठीक होता है |

एक रोचक मामला इस प्रकार है | राज्य परिवहन की बस में एक बार यात्रा कर रहा था जिसमें 36 सवारियां बेटिकट थी अचानक चेकिंग आई, गाडी रुकवाकर निरीक्षण किया गया | चेकिंग दल ने सिर्फ 18 सवारियां बेटिकट का रिमार्क दिया |  कंडक्टर और ड्राईवर गाड़ी को लेकर आगे बढे | अब कंडक्टर को आगे चेकिंग का कोई भय नहीं  था इसलिए रास्ते में एक भी सवारी को टिकट नहीं दी |   दो दिनों तक वह बिना व्यवधान के चलता रहा | आखिर मेरी शिकायत और सूचनार्थ आवेदन पहुँचने के बाद उसे निलम्बित किया गया | बेटिकट यात्रा करवाने के मामले में मैंने सम्बंधित मजिस्ट्रेट के यहाँ शिकायत भेजी और उसके समर्थन में मेरा व मेरे एक सह यात्री का शपथ –पत्र भी प्रस्तुत किया | दंड प्रक्रिया संहिता में यह प्रावधान है कि किसी लोक सेवक पर आरोप लगाए जाए तो उसके लिए शपथ पत्र दिया जा सकता है ताकि उसके चरित्र के बारे में खुली चर्चा न हो |  ठीक इसी प्रकार दंड प्रक्रिया  संहिता के अनुसार मजिस्ट्रेट  से मौखिक शिकायत  भी की  जा सकती है और  किसी गुमनाम अपराधी के विषय में भी शिकायत की जा सकती है क्योंकि  संज्ञान अपराध का लिया जाता है न कि शिकायतकर्ता या अपराधी का | जबकि मजिस्ट्रेट  पक्षकारों को तंग परेशान और हैरान करने के लिए जहां मौखिक का प्रावधान हो वहां लिखित और जहां लिखित का प्रावधान हो वहां मौखिक पर जोर देकर अपनी शक्ति का बेजा प्रदर्शन करते हैं | न्यायालयों में मंत्रालयिक स्तर पर भ्रष्टाचार को वे जानते हैं और उनको जानना चाहिए किन्तु फिर भी सब यथावत चलता है | भारत में तो न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों के लिए तारीख पेशी देना, जैसा कि रजिस्ट्रार जनरलों की एक मीटिंग में कहा गया था, एक आकर्षक धंधा है और इससे न्यायालयों की बहुत बदनामी हो रही है|
किन्तु  मजिस्ट्रेट ने न केवल मेरी  शिकायत को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि वहां उपस्थित होकर बयान नहीं दिए और अपराधी का नाम नहीं था  बल्कि मुझ पर खर्चा ( अर्थदंड)  भी लगा दिया गया | निचले न्यायालयों की  शक्तियां सम्बंधित कानून के अनुसार ही होती हैं और दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है कि एक शिकायतकर्ता पर खर्चा लगाया जा सके | मामले में  सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएं क्रमश: दायर की गयी किन्तु कहीं से कोई राहत नहीं मिली | अब मामला पुन: मजिस्ट्रेट के पास खर्चे की  वसूली के लिए आ गया और मुझे नोटिस जारी किया गया | मैंने मजिस्ट्रेट न्यायालय को निवेदन किया कि  इस न्यायालय को अर्थदंड लगाने का कोई  अधिकार ही नहीं है  तब जाकर  कार्यवाही रोकी गयी  किन्तु फिर भी परिवहन निगम के दोषी कार्मिकों पर कोई  कार्यवाही नहीं की गयी |

क्या कोई विधिवेता बता सकता है कि देश में कैसा कानून और न्याय है , किस स्तर के न्यायाधीशों को कानून का कोई ज्ञान है ...?  अब जनता कानून की मदद कैसे, कब और क्यों कर सकती है ..? ऐसे लगता है देश के न्यायालय जनता की  सेवा के लिए नहीं अपितु पीड़ित पक्षों का और उत्पीडन के लिए बनाए गए नयी तकनीक के यातना गृह हैं |


अरविन्द बाबू दिल्ली का सिंहासन कोई फूलों की सेज नहीं काँटों भारा ताज है ....

केजरीवाल जी आपने  जनता को काफी कुछ मुफ्त में देने और भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वादा  किया है | लोकपाल कानून तो आपके दायरे में ही नहीं है और  इस कानून से भी जनता का कितना  भला हो सकता है मैं नहीं जानता किन्तु यह अवश्य जानता हूँ कि राजस्थान में लोकायुक्त कानून 40 से अधिक वर्षों से बना हुआ है और वहां कितना भ्रष्टाचार है  आप जानते ही होंगे | कानून तो जनता को भ्रमित करने के लिए बुना जाने वाला वह मकडजाल है जिसमें जनता को मछली की तरह फंसाया जा सके | दिल्ली सरकार तो एक स्थानीय निकाय से अधिक कुछ भी नहीं  है  जिसके पास बिजली, पानी , सफाई, परिवहन आदि मुद्दे ही हैं  और वे भी केंद्र सरकार के रहमोकरम   पर निर्भर  है | उसके पास न न्यायालय है न पुलिस .. फिर भ्रष्टाचारियों को कौन पकड़ेगा  ..कौन दंड देगा ..   फिर ...आपके पास तो वही सरकारी मशीनरी –उपकरण हैं जो आज तक थे | पूर्व में  जो मुख्य सचिव आपको मिले थे वे  शीला दीक्षित सरकार में स्कूलों में  कंप्यूटर घोटाले में मुख्य भूमिका निभाने वालों में से एक थे | क्या आप  कोई अधिकारी विदेशों से आयात करेंगे ? स्मरण रहे जंग खाए हुए और  भोंथरे औजारों से युद्ध नहीं जीता जा सकता | जनता के लिए सबसे बड़ा सरदर्द दिल्ली पुलिस ही है जिसमें 100  तो बलात्कार के आरोपी कार्यरत हैं | पुलिस और प्रशासनिक पद तो सरकारों में लगभग नीलाम होते हैं जो ऊँची बोली लगाने वाले को मिलते हैं | आपके पास अपना स्वतंत्र कौनसा तंत्र है ? आपके सदस्यों में भी एक तिहाई दागी हैं | जिस समुदाय विशेष का आपको समर्थन मिला है, आंकड़े बताते हैं कि वे भी  आम भारतीय से 24% अधिक अपराधी हैं | आपकी पार्टी पर यह भी आरोप है कि उत्तराखंड के बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए इकठा किया गया चन्दा भी आपने उनको नहीं दिया है |  शीला दीक्षित के घोटालों की फाइलें आपके पास काफी लम्बे अरसे से हैं किन्तु आपने उन पर कोई कार्यवाही नहीं की –शायद  अब राजनीतिक लाभ मिल सके | आपने पहले गडकरी पर आरोप लगाए औए बाद में उनसे माफ़ी मांगी |
जनता पर आपको कर लगाने के बहुत ही सीमित अधिकार हैं | पिछलीबार  जब हाई कोर्ट की  फीस बढाई गयी थी उसे भी दिल्ली सरकार के दायरे से बाहर मानकर उसे निरस्त कर दिया था | अब नए वर्ष से जीएसटी  लागू हो रहा है –केंद्र का सिकंजा कसेगा , राज्यों की मुश्किलें और बढ़ जायेंगी | इस वर्ष व्यापार और उद्योग लगभग ठप हैं, कर संग्रहण  मात्र  आधा ही हो  पाया है | ऐसी स्थिति में राज्य  कर और केंद्र से मिलने वाली राशि में कटौती ही होगी फिर आपके इन वादों का क्या होगा | जनता आपके  इन लुभावने भाषणों को कितने दिनों तक सुनेगी ? जनता को भाषण नहीं राशन चाहिए अब तक तो आपको भी पता लग गया होगा | जहां तक  केंद्र से सहयोग मिलने का प्रश्न है सो शीला दीक्षित भी केंद्र  को कोसती रहती थी जबकि केंद्र में उनकी ही पार्टी का शासन था | केंद्र में अब तो आपका कोई विशेष हस्तक्षेप भी नहीं है |

आम नागरिक इस देश में स्वभावतः बेईमान नहीं है और उनको बेईमान बनाने का श्रेय भी राजनेताओं को ही जाता है | एक भूखे द्वारा अपने पेट की  भूख मिटाने और ऐश के लिए चोरी करने में अंतर होता है | मेरा अनुभव है कि वर्षा व फसल अच्छी   होने पर खेत  में रास्ते पर  पड़े फलों को भी यहाँ कोई नहीं उठाता है | वैसे भी 20000 रुपये महीना या अधिक कमाने वाले इस देश में मात्र 3% लोग ही हैं और उनमें से भी 70% तो संगठित क्षेत्र के कर्मचारी हैं | देश की 70% जनसंख्या सब्सिडी से मिलने वाले अन्न से अपना पेट भरती है | इस क्षुद्र राजनीति के परिवेश में में आप क्या कुछ  कर पाएंगे?  न्यायाधीश जगमोहन लाला सिन्हा जब इंदिराजी के विरुद्ध निर्णय देने वाले थे तो उनकी जान को भी ख़तरा था और मजबूरन  निर्णय उनको स्वयं ही टाइप करना पडा था | इंदिरा सरकार को नसबंदी ले डूबी और मोरारजी को नशाबंदी |   एक शराब निर्माता ने 6 करोड़ रूपये खर्च करके मोराजी सरकार गिरा दी थी और चरणसिंह जी प्रधान मंत्री बने थे  किन्तु वे तो जांच आयोग  और कमिटी की फाइलों में ही उलझकर रह गए , कभी संसद के दर्शन भी नहीं कर पाए और वे सारी जांचें भी धरी रह गयी थी | 

केजरीवाल का राजनीति में अवतरण ..

वैसे तो  अब केजरीवाल की  कई महिमा गाथाएं मीडिया में उपलब्ध हैं और वे अपने आपको आम आदमी बता रहे हैं | केजरीवाल ने सूचना  कानून आने के बाद  सक्रियता दिखाई और कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों – फिल्म स्टारों , क्रिकेटरों  आदि के सानिद्य में कई सभाएं की  और भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े नजर आये | इच्छुक व  संभावित भागीदार व्यक्तियों  को डाक द्वारा और फोन से भी आमंत्रण भेजे गए थे |  उनके कार्यालय में होने वाली फोन कालों का जवाब भी दिया जाता था | उनके ही एक सहयोगी श्री सोमनाथ भारती ने दिनांक 12.2.12 को मुझे भी अपनी टीम में शामिल होने का निमंत्रण दिया था |  किन्तु मैंने अपनी आशंकाएं व्यक्त की – “Though I have no hesitation to join a team with real Cause. But I see there is no organisation in India which has dealt ANY PROBLEM from grass root level. Most of the organisations (backed by this or that party) are prestige hungry and hardly do any social work except exhibitive nature superfluous jobs. If any organisation would have bailed out India from the problem, the legislatures are the best organisations even elected by people. If associations of elected representatives in India can't make any dent it can't be believed that any organisation on Bharatbhumi may do conceptual work of sustainable nature.

किन्तु  गत बार मुख्य मंत्री बन जाने के बाद घंटों तक इंतज़ार के बावजूद उनसे विमर्श नहीं हो सका | मेरे  एक दिल्ली निवासी मित्र ने भी पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए कई  बार उनसे संपर्क का प्रयास किया |   किन्तु वे सभी निरर्थक रहे | अब  वे कितने आम हैं और जनता के दुखदर्द में कितने भागीदार होंगे , भविष्य के गर्भ में है | भारतीय जनता पार्टी को  हराना कोई बड़ी बात नहीं है | राजनारायण ने भी इंदिरा गाँधी को टक्कर  दी थी किन्तु उनका सृजनात्मक  योगदान क्या रहा  |


राजनेता चुनाव में पैसा इस लिए खर्च करते  हैं, क्योंकि इन्हे जनप्रतिनिधि बनना है, विधान सभा, लोकसभा या स्थानीय निकायों में जनप्रतिनिधि बनकर इनका कहना है, कि  ये जनता की सेवा करेंगे, बिना जनप्रतिनिधि बने ये कोई सेवा नही कर सकते, क्योंकि सेवा करना इनकी आदत में नही है, कभी आम जनता के प्रश्न  पर आंदोलन करते हुए नही देखे गये, मुहल्ले में लोगों के भले में काम करते हुए नही देखे गये, मज़दूर और किसान की बात चुनाव के दौरान ही करते देखे जा रहे हैं, वरना निजी ज़िंदगी मज़दूरों से नफ़रत करते हुए गुज़री है, किसानों को जाहिल गँवार कहते हुए इनके मुँह से अक्सर सुना जाता है, ऐसे कितने ही प्रत्याशी हैं, जो निजी स्वार्थ के लिए, अपने काले धंधे छुपाने और सरकारी अधिकारियों पर धौंस जमाने के लिए चुनाव लड़ते हैं, एक बार चुनाव लड़ने के बाद नेता होने का लेबल इनके नाम के साथ जुड़ जाता है, जीतें या हारें, लेकिन फिर वो गैर क़ानूनी धंधे धड़ल्ले से कर सकते हैं, क्योंकि प्रशासन इनसे ख़ौफ़ खाएगा, मुहल्ले के गुंडे इनके दोस्त बन जाएँगे| तमाम नाजायज़ कार्य करने की इनको छूट मिल जाएगी, ऐसी है चुनाव लड़ने के पीछे मानसिकता, तमाम घाघ किस्म के लोग राजनीति को कितना भ्रष्ट और गंदा करेंगे, कुछ कहा नही जा सकता."

Wednesday, 21 January 2015

शर्म जो इनको आती नहीं ..!!

हमारे सांसदों को मुफ्त का आवास, नौकर चाकर, दो दो सेक्रटरी , बिजली,पानी,  फोन , वाहन भत्ता  आदि लाखों रूपये प्रतिमाह की सुविधाएं जनता के खून पसीने की   कमाई से मिलते हैं | मुफ्त का आवास सुलभ न हो तो पांच सितारा होटलों  में ठहरते हैं और वहां क्या क्या करते हैं यह भी जनता जानती है | सांसद कोटे भी आय का अच्छा  और नया स्त्रोत है | प्रश्न पूछने और न पूछने ( चुप रहने ) के लिए भी धन मिल जाता  है | फिर भी   देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है!
बैंक कर्मचारियों का वेतन समझौता दिनांक 01.11. 12 से बकाया है | तात्कालीन वित्त मंत्री  चिदंबरम ( जिन्हें छोटे बचे आडम्बरम  कहते हैं) ने कहा कि क्या सारा मुनाफा कर्मचारियों को ही दे दें | मान्यवर जो अन्य कर्मचारी कोई   मुनाफा नहीं कमाते फिर उनको क्या और क्यों  देते हो !पुलिस के मामलों में सिर्फ 2% में ही सजा होती है फिर उनके बारे में क्या कहना चाहेंगे ?अब सरकार का कहना है कि 5 साल के बाद  10% वेतन बढवा लो | आपने तो 4 साल में ही अपना वेतन 1200% बढ़ा लिया तब ये सारे प्रश्न कहाँ   चले गए और आप लोग जो 67  साल से काम कर रहे हो उसे भी जनता देख रही है | क्या बैंक कर्मचारी आप एमपी (  एक अर्थ  मलेरिया पैरासाइट भी होता है)  को देने के लिए लाभ कमा करके दें ? बैंक लाभ कहाँ से   कमाएंगे जब आप अदानी जैसे लोगों को ऋण दिलवाते हो  और सस्ती लोकप्रियता और  राजनैतिक लक्ष्यों की  पूर्ति के लिए ऋण दिलवाते हैं | बिना जमा के खाते खुलवाते हैं  और खातों में सिर्फ 300  रुपये महिना गैस सब्सिडी जमा हो व उसे ग्राहक तुरंत निकाल ले | बदले में आप लागत का आधा भी पूर्ति नहीं करते | देश में मात्र 3% आयकर देने वाले हैं  -तब बैंक में जमा करवाने की  हैसियत कितने लोगों की है |

सब्सिडी जब सिलिंडर की  कीमत में से सीधे घटाकर मिल रही थी तब क्या परेशानी थी | रहा सवाल फर्जी का तो जो लोग आपके सानिद्य में फर्जी सिलिंडर लेते हैं,  वे फर्जी और कई खाते भी खुलवा लेंगे | माननीय   जन प्रतिनिधियों के घरों पर ही 15-20  सिलिंडर एक साथ मिल जाते हैं| आधार  में आंकड़ों की  सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है और वह भी आसानी से बनते नहीं | लोग 3-4 चक्कर लगा चुके हैं लेकिन पूरा दिन खराब करने और ऑटो के पैसे खर्च करने के बावजूद भीड़ के कारण आधार कार्ड नहीं बनवा पाये हैं | फिर डीबीटीएल योजना तो  दीर्घकाल में जनता के साथ एक छलावा साबित होगी | अभी यदि आप सब्सिडी बंद कर देंगे तो बवाल उठ जाएगा इसलिए इसे धीरे धीरे कम करके बंद कर सकते हैं | एक दिन कह देंगे कि हमारे पास  बजट नहीं सब्सिडी के लिए जबकि निजी विमानन कंपनियों को उधार देने के लिए आपके पास काफी महँगा इंधन भी है  |

जय मूर्छित लोकतन्त्र की!!

लालू यादव के परिजनों ने  सुप्रीम कोर्ट में 1 मार्च 2007 को रिव्यु याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा केन्द्रीय  अन्वेषण ब्यूरो को राज्य सरकार की सहमति के बिना जांच का आदेश देने को क्षेत्राधिकार से बाहर बताया और कहा कि यह राजनीति से प्रेरित है | याचिका पर न्यायाधिपतिगण कबीर और दत्तु ने सुनवाई  की और 17 फरवरी  2011 को निर्णय सुरक्षित रखा लिया | यह निर्णय 13  दिसंबर 2012 को घोषित किया गया और धारित किया कि उक्त आदेश सही था | यह विलम्ब इसलिए किया गया कि इस बीच होने वाले वाले चुनावों पर इसका राजनैतिक प्रभाव न   पड़े |  क्या न्यायाधीश राजनीति से मुक्त हैं ..? देश हित से ज्यादा किसी राजनेता का भविष्य इस महान भारत में ज्यादा महत्वपूर्ण है | 
हाल ही आशाराम ने बीमारी के आधार पर जमानत मांगी तो उसे यह कहा गया कि उसे ऐसी   कोई बीमारी नहीं है जिसके लिए ऑपरेशन करवाना पड़े या  इलाज के लिए घर जाना पड़े | किन्तु प्रश्न यह है कि  क्या यही प्रश्न राजनेताओं को जमानत के वक्त भी पूछा जाता है ? और संजय दत्त को तो उसकी बहन के प्रसव काल में मदद के लिए भी जमानत दे दी जाती है | संसारचन्द्र  गंभीर बीमारियों से जूझता हुआ मर जाता है लेकिन उसे इलाज के लिए  जमानत नहीं दी जाती |इसी तरह एक साध्वी गंभीर बीमारियों से जूझ रही है परन्तु जमानत नहीं मिली |  अक्षरधाम के अभियुक्तों को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मुक्त किया है कि निर्दोष लोगों को फंसाया गया है किन्तु  इस बीच लगभग अनुचित रूप से भुगती गयी जेल यातनाओं के लिए उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया है | आपराधिक मामलों में किसी को दोषी तभी ठहराया जाता है जब वह तर्कसंगत संदेह से परे दोषी  पाया गया हो|  तर्क संगत संदेह से परे दोषी  पाए जाने और  निर्दोष को फंसाए जाने में जमीन  आसमान का अंतर होता है और इसे महज मत  का अंतर ( Difference of opinion ) कहना सही नहीं   होगा और न ही इसे कोई मानवीय भूल के आवरण से ढका जा सकता | इस प्रकरण में  आपराधिक न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है  व माना जा सकता है कि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं | कुछ विद्वान् यह भी  कह सकते हैं कि अक्षरधाम के अभियुक्तों ने मुआवजा की  मांग नहीं की थी किन्तु सुप्रीम कोर्ट तो पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी राहत स्वीकार कर सकता है और कई मामलों में बिना मांगी राहतें भी दी हैं | वैसे याची अपनी याचिका में परम्परा के तौर पर यह निवेदन भी करते हैं | इस प्रकरण में भी जिन अभियुक्तों ने अपील नहीं की  थी उनको भी दोषमुक्त किया है | सुप्रीम कोर्ट भी मांगी गयी सभी राहतें स्वीकार नहीं करता तो फिर बिना मांगे राहत भी तो दी जा सकती है | दूसरी परंपरा यह है कि  ज्यादा राहत माँगने पर सम्पूर्ण याचिका को भी खारिज कर दिया जाता  है इसलिए इस अंदेशे से बचने के लिए पक्षकार ज्यादा राहतें माँगते भी नहीं हैं |
यदि ऐसा मानवीय भूल के कारण हो तो फिर आम नागरिक के पक्ष में और प्रभावशाली लोगों के हित के विरुद्ध ऐसी भूलें कभी क्यों नहीं होती | यदि मानवीय भूल क्षम्य हो तो फिर चिकित्सकीय लापरवाही के लिए भी दंड और मुआवजा क्यों दिया जाता है | अक्सर न्यायाधीशों के अनुचित फैसलों  का यह कहकर बचाव किया जाता है कि अपील में उन्हें सुधारा जा सकता है और यही बात दोहराते हुए यदि अपीलीय न्यायालय अनुचित फैसला दे दे तो फिर न्याय किस स्तर और मंच पर मिलेगा | और यदि यही बात एक चिकित्सक कहे कि उसके द्वारा हुई मानवीय भूल को किसी अन्य चिकित्सक से इलाज करवाकर सुधारा जा सकता था तो फिर क्या इसे न्यायालय स्वीकार कर लेंगे |
हाल ही में पीके फिल्म पर रोक लगाने से इन्कार करते हुए भी कहा गया कि रोक लगाने से जो व्यक्ति इसे देखना चाहते हैं उनके अधिकार प्रभावित होंगे इसलिए रोक नहीं लगाई जा सकती | किन्तु यही तर्क फिर पोर्न फिल्मों और वेबसाइटों के विषय में भी तो लिया जा सकता है |राजस्थान सरकार ने एक सुनियोजित कूटनीतिक चाल के तहत पंचायत राज अधिनियम में एक अध्यादेश के जरिये संशोधन करके अशिक्षित लोगों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जिसके विरुद्ध अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी | अनुच्छेद 32 में याचिका दायर करना संविधान में मूल अधिकार बताया गया  है किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को वापिस कर दिया और उच्च न्यायालय जाने को कहा जबकि उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद   226 में याचिका स्वीकारना विवेकाधिकार माना जता है | यह समझ से बाहर है कि जब अनुच्छेद 32 में याचिका दायर करना मूल अधिकार  है तो फिर सुप्रीम कोर्ट इससे मना कैसे कर सकता है | 
आपराधिक मामलों में जमानत देने की  शक्ति निचले स्तर के न्यायालयों , सत्र न्यायालयों और उच्च न्यायलयों में निहित  है किन्तु तसलीमा नसरीन ने  जमानत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दयार की  और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे डाली  और उसे यह कभी नहीं कहा गया कि वह पहले निचली सीढियां पार करके इस स्तर तक पहुंचे | दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन , सुधार और डॉक्टरों की  कमीशन खोरी रोकने के लिए दायर की गयी किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि   इस सम्बन्ध में सरकारी मशीनरी है इसलिए उनके पास जाएँ | प्रश्न यह है कि दिखावट  के तौर पर सरकारी मशीनरी तो लगभग हर मामले के लिए है और उसे उनके अधिनस्थों  कि कार्यशैली का ज्ञान होता है व होना चाहिए किन्तु वे  कोई निराकरण नहीं करते |  यदि सरकारी मशीनरी ही निराकण कर दे तो रिट याचिकाएं दायर ही क्यों होंगी जबकि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के लगभग 75% मामलों में सरकारें ही पक्षकार  होती हैं |
बिहार में भागलपुर में पीठासीन सत्र न्यायाधीश पर पुलिसवालों ने व्यक्तिगत हमला कर दिया जिसके लिए अवमान का मामला दर्ज कर उन्हें 2 माह के भीतर ही सजा सुना दी गयी किन्तु अरुण शोरी द्वारा दिनांक  13.8.90 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित सम्पादकीय के विरुद्ध दायर अवमान याचिका पर आखिर  24 वर्ष बाद  निर्णय देकर अभियुक्त को मुक्त किया गया है |जबकि न्यायाधीशों को यह मानना था कि यह प्रकाशन न्यायपालिका की  अस्मिता पर आक्रमण है | कारण चाहे कुछ भी रहे हों किन्तु जनता के मन में न्यापालिका के प्रति संदेह होना स्वाभाविक है कि इतने विलम्ब के पीछे क्या छिपे हुए उद्देश्य रहे होंगे | जहाँ अनुकूल बेंच का इंतज़ार भारत   में सामान्य बात मानी  जाती है  वहीँ न्यापालिका भी किसी के विरुद्ध अवमान का मामला लम्बे समय तक विचाराधीन रखते हुए उसे भयभीत रख सकती है और आगे भविष्य में न्यायपालिका के विरुद्ध कुछ भी विचार प्रकट रखने से रोक सकती है क्योंकि उसके सर पर तलवार लटकी हुई है इस प्रकार विलम्ब करके  एक दूसरे को ब्लैकमेल करके दोनों लाभ उठा सकते हैं |अहमदाबाद के मजिस्ट्रेट ब्रह्मभट्ट  पर आरोप था कि उसने चालीस हजार रूपये लेकर 4 प्रमुख व्यक्तियों के नाम वारंट जारी किये  किन्तु  एक सप्ताह में रिपोर्ट मिलने  के बावजूद मामला में सुप्रीम कोर्ट में 10 साल से विचाराधीन है | मेरे स्वतंत्र  मत में, अपवादों को छोड़कर ,सभी  स्तर के  भारतीय न्यायाधीश न तो विद्वान हैं और न ही भले हैं |

भारत में न्याय के ये तो कुछ नमूने मात्र हैं , असली कहानी तो न्यायार्थी बेहतर जानते हैं |

Thursday, 8 January 2015

जनता की कीमत पर उद्योगपतियों को फायदा!!

सरकारी बैंकों में छोटी बचत वाले वे लोग धन जमा करवाते हैं जिनके पास धन लगाने को कोई व्यवसाय नहीं होता और इन छोटी छोटी बचतों को इकठा करके  बैंकें बड़े उद्योगपतियों को ऋण देती हैं | इन जमाकर्ताओं में एक बड़ा वर्ग बुढ़े बुजुर्गों,पेंसनरों  और ऐसे लोगों का भी शामिल है जो कि ब्याज से अपनी आजीविका चलाते हैं | लगभग 30 साल पहले सरकार ने रिजर्व बैंक के उप गवर्नर की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि  बैंकों की  मियादी जमा की ब्याज दरें महंगाई की दर से 2% अधिक होनी चाहिए  ताकि उन लोगों को लाभ मिल सके और बचतें प्रोत्साहित हो सकें | अन्यथा यदि मंहगाई की दर ब्याज से अधिक होगी तो लोगों को बचत पर ऋणात्मक  ब्याज मिलेगा और लोग बचत करने की  बजाय उन वस्तुओं में निवेश करना चाहेंगे जिनमें  महंगाई की दर अधिक है |  भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक की महंगाई की  औसत दर 10% वार्षिक के लगभग आती और गत दशक के लिए तो यह  12% के आसपास है | ऐसी स्थिति में बैंकों की  मियादी जमा की  दर अब 14% के आसपास होनी चाहिए | प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण के लिए तो सरकार ने ब्याज दरें नियत कर ही रखी हैं और ब्याज दर नीची रखने का फायद सिर्फ बड़े उद्योगपतियों को मिलता है |
ब्याज दर काम होने और महंगाई की दर अधिक होने से ही जमीन जायदाद और अन्य आवश्यक वस्तुओं में धन लगाने, मांग बढ़ाकर कीमतें ऊँची करने की  प्रवृति पनपती है | भारत में स्वर्ण , स्त्री  और  जमीन  ( GOLD, LAND and WOMEN   ) में निवेश करने की  सदा से  प्रवृति रही है और इनका ज्यादा से ज्यादा संचय करना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता रहा है | इस कारण भारत में उद्योग व्यवसाय के लिए पहले से ही बहुत कम धन उपलब्ध रहता है | भारत में आज भी निजी  क्षेत्र में ऐसी एक भी राष्ट्रीय स्तर की बैंक या वित्त कंपनी नहीं है जिसका 20 साल से ज्यादा उज्जवल इतिहास हो | बहुत सी आई .....और फ़ैल हो गयी या अन्य में विलीन हो गयी | पीयरलेस, पर्ल्स  , सहारा   आदि इसी श्रृंखला के कुछ नाम है | अत: जनता के पास सरकारी बैंकों में धन जमा करवाने के अतिरिक्त कोई सुरक्षित उपाय नहीं है | सरकार इस विकल्पहीनता  का अनुचित  लाभ उठाकर निजी उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाना चाहती है  और छोटी  बचत करने वाली जनता का शोषण करना चाहती है ताकि महंगाई की  दर से नीची दर पर ऋण मिले तो उद्योगपति यदि कुछ उत्पादन नहीं करे तो भी उसकी सम्पति की कीमत में वृद्धि हो |
उद्योंगों में प्रत्यक्ष और  अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पेट्रोलियम का प्रयोग होता है और   गत समय से पेट्रोलियम के दाम लगातार गिर रहे हैं जबकि इसका सरकार न जनता को पूरा लाभ देना चाहती और   न उद्योंगों को |बल्कि इन पर उत्पाद शुल्क और बिक्री  कर बढ़ा रहे है | वाह रे भारत की  कल्याणकारी सरकार ! जो लाभ जनता और उद्योगों को बिना किसी हानि के मिले उसको और कर  लगाकर छीने और कमजोर लोगों को जमा पर देय ब्याज दर घटाए ताकि बैंकें उद्योगों को सस्ते ऋण दे सकें | ताजुब होता है जब सरकार देश के लोगों को कम ब्याज देना चाहे औए विदेशियों को यहाँ निवेश के लिए अतिरिक्त छूट देना चाहे| स्मरण रहे ये यही अरुण जेटली हैं जिन्होंने अलग चाल, चरित्र और चेहरा का दवा करने वाली गत भाजपा सरकार पर कुछ आरोप लगने पर कहा था कि राजनीति कोई साधु  संतों का काम नहीं है | वित्तमंत्री हमारे हैं या  उद्योगपतियों के  जो रिज़र्व बैंक के गवर्नर पर ब्याज दर घटाने के लिए दबाव डाल रहे हैं ?