Wednesday, 1 February 2012

दोयम श्रेणी के सेवकों को सर्वोच्च वेतनमान ........


गत वर्ष  मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा अपर सत्र न्यायाधीश के पद के लिए लगभग सम्पूर्ण भारत के 3000 वकीलों ने परीक्षा दी थी और परिणाम बड़े ही दुखद रहे| प्रारंभिक परीक्षा में मात्र 226 परीक्षार्थी  ही उत्तीर्ण हुए| मुख्य परीक्षा में 22 परीक्षार्थियों के अलग अलग पेपरों में शून्य अंक था व उत्तीर्ण होने हेतु आवश्यक (आरक्षित श्रेणी 33% व सामान्य श्रेणी 40%) अंक एक भी परीक्षार्थी  प्राप्त नहीं कर सका| मात्र 6 परीक्षार्थी ही 35% अंक प्राप्त कर पाए| यही नहीं गत वर्ष राजस्थान उच्च न्यायालय ने विधिक शोध सहायक के लिए परीक्षा ली थी जिसमें भी एक भी परीक्षार्थी उत्तीर्ण नहीं हुआ और अब यह परीक्षा पुनः अन्य आधार पर करवाई गयी है| अनुभव में भी यही सामने आया है कि देश के अधिकाँश वकीलों, न्यायाधीशों और उनके मंत्रालयिक स्टाफ को शायद ही कानून का कोई सम्यक ज्ञान हो व मुश्किल से ही वे कानून का अध्ययन करने में कोई रूचि रखते हों अपितु वे परिपाटियों और परम्पराओं का निर्वाह मात्र कर रहे हैं| वे कार्य किसी ढंग से इसलिए कर रहे होते हैं कि उनका पूर्ववर्ती या साथी उस ढंग से कार्य रहा है| उनकी कार्यशैली में तर्क का लगभग अभाव पाया जाता है|    
 हाल ही में राजस्थान राज्य के दौरे पर आये माननीय न्यायाधिपति अल्तमस कबीर ने भी न्यायाधीश पद के लिए योग्य आदमियों के अभाव की पुष्टि की है| अन्य भारतीय राज्यों की स्थिति भी कोई ज्यादा अच्छी नहीं लगती है| उक्त विवेचन से यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि देश में प्रतिभा का अभाव है किन्तु दुखद विषय यह है कि प्रतिभा के लिए भारत में विधि-व्यवसाय आकर्षण का केंद्र नहीं हैं अर्थात न्यायालयों में सफल होने के लिए प्रतिभा या विधि का ज्ञान नहीं बल्कि न्यायालयों की परम्परा के अनुरूप अन्य प्रबंध-कौशल, व्यवहार कुशलता आदि की आवश्यकता है|

प्रतिभाशाली व गरिमामयी लोग विधि-व्यवसाय के वातावरण को अपने अनुकूल व सम्माननीय नहीं पाते हैं| यद्यपि देश में सरकारी क्षेत्र में सर्वाधिक ऊँचा वेतनमान न्यायिक अधिकारियों को ही दिया गया है और फिर भी इस सेवा में देश की श्रेष्ठ प्रतिभा की कोई रूचि नहीं है अर्थात नागरिकों की जेब से सर्वोच्च वेतनमान ऐसे लोक सेवकों को देना पड़ रहा है जो प्रतिभा की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट नहीं हैं| और इससे भी अधिक चिंता का विषय है कि कालांतर में इस दोयम श्रेणी की प्रतिभा के भरोसे देश के संवैधानिक न्यायालय सौंप दिए जाते हैं|

3 comments:

  1. If we fail to find the right talent in our country then why not look to people of other nationalities. Justice should be delivered as per the law in a time bound procedure and by people who are the best. I do understand people of vested lobbies will raise a hue and cry that we cannot allow other nationalities to come into our legal system and their reasons are obvious. In the end if there is no just legal provoding system the country is bound to become a Banana Republic which India is almost trying hard to be. Maybe you can raise this point of selecting the best legal brains from all over the planet as a way to go for India.

    2 February 2012 00:45

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  2. every person is after short cuts to earn money ,,,, so talent is on back seat ,,,,, a talented person cant earn by cheating others ....
    need of the day is to encourage talented persons but who cares ....

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