Wednesday, 5 October 2011

वकीलों से सावधान ......



वकीलों से सावधान ......

जी हाँ ! क्या आपने वकील नियुक्त करने पूर्व कभी वकालतनामे का अवलोकन किया है ? यदि नहीं तो उपयुक्त समय आने पर अब अवश्य करें| वैसे वास्तविकता तो यह है कि वकालतनामें का मुवक्किलों ने तो क्या अधिकांश वकीलों ने भी अवलोकन नहीं किया होगा| आप पाएंगे कि इसमें समस्त शर्तें आपके हित के विपरीत हैं और आप के अनुकूल मुश्किल से ही कोई शर्त होगी| इनमें समस्त दायित्व आप (मुवक्किल) पर डाला गया है और वकील साहब ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली है|  इस महान भारतभूमि में कानून एवं न्याय तंत्र (मुकदमेबाजी उद्योग) अभी भी स्थापित (अस्वस्थ) परम्पराओं पर ही चल रहा है| कानूनी प्रावधान का सहारा लेना स्वछन्द  विचरण करने वाले न तो वकील मुनासिब समझते हैं और न ही न्यायाधीश| इस तथ्य के समर्थन में मैं कहना चाहूँगा कि हाल ही में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा अपर सत्र न्यायाधीश के पद के लिए लगभग सम्पूर्ण भारत के 3000 वकीलों ने परीक्षा दी थी और परिणाम बड़े ही दुखद रहे| प्रारंभिक परीक्षा में मात्र 226 परीक्षार्थी  ही उत्तीर्ण हुए| मुख्य परीक्षा में 22 परीक्षार्थियों के अलग अलग पेपरों में शून्य अंक था व उत्तीर्ण होने हेतु आवश्यक (आरक्षित श्रेणी 33% व सामान्य श्रेणी 40%) अंक एक भी परीक्षार्थी  प्राप्त नहीं कर सका| मात्र 6 परीक्षार्थी ही 35% अंक प्राप्त कर पाए| देश में सार्वजनिक सेवाओं में न तो सम्यक ज्ञान की आवश्यकता है और न ही ज्ञानवान और गरिमामयी लोग भारत की प्रशासनिक और न्यायिक सेवाओं के दूषित वातावरण में आना उचित समझते हैं|अभी हाल ही में आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी सर्वोच्च अंक प्राप्तकर्ता अभ्यर्थी के मात्र 53% अंक ही थे| यही नहीं राजस्थान उच्च न्यायालय ने विधिक शोध सहायक के लिए परीक्षा ली थी जिसमें भी एक भी परीक्षार्थी उत्तीर्ण नहीं हुआ और अब यह भर्ती मात्र साक्षात्कार के आधार पर ली गयी है| राजस्थान उच्च न्यायालय में दो वर्ष पूर्व अपर सत्र न्यायाधीशों के पद पर हुई भर्ती में माननीय मुख्य न्यायाधिपति जगदीश भल्ला पर भ्रष्टाचार के आरोप किस तरह लगे थे और अंततोगत्वा वह भर्ती निरस्त हुई इसे सारा भारत जानता है|

देश में कानून बनाने के लिए परामर्श देने हेतु विधि आयोग कार्यरत है जिसके सदस्य जानेमाने न्यायविद, अनुभवी न्यायाधीश और वकील होते हैं| स्वतन्त्रता के बाद देश में अधिकांश विधि एवं न्याय मंत्री भी अनुभवी वकील रहे हैं| हमारे सांसदों में भी एक बड़ा हिस्सा विधि की शिक्षा प्राप्त तबके का है| देश में कानून और न्याय व्यवस्था की स्थिति पाठकों के सामने है जो गवाही देती है कि हमारी कानून निर्माण और ज्ञान की गुणवता किस स्तर की है| अभी हमारे गृह मंत्री, जोकि पेशे से स्वयम एक वकील हैं,  ने यातनाओं के विषय में एक विधेयक रखा था| इस विधेयक में कुल 7 धाराएं हैं जिनमें से 5 धाराएं तो औपचारिक हैं और मात्र दो धाराओं में अपराध व उनकी सजाओं को परिभाषित किया गया है| इन दो धाराओं में से भी एक धारा में गंभीर उपहति और प्राण को खतरे से सम्बंधित हो जो दंड संहिता में पहले से विद्यमान है| शेष अन्य प्रकार की यातनाओं को इस विधेयक में कोई स्थान नहीं दिया गया है जबकि पुलिस द्वारा नाना प्रकार की और नई नई यातनाएं दी जाती हैं किन्तु वे सब अधिनियम के दायरे से मुक्त हैं| दूसरी ओर फिलिपिन्स कि ओर देखें तो उन्होंने इसी विषय पर 27 धाराओं वाला व्यापक कानून  बनाया है जिसमें हर संभव प्रयास किया गया है कि सभी प्रकार की यातनाएं अधिनियम के दायरे में आयें और उनमें उपचार उपलब्ध हो| इस अधिनियम में 30 से अधिक प्रकार की यातनाओं की उदाहरणात्मक सूची देते हुए स्पष्ट किया गया है कि यह सूची मात्र नमूना है किन्तु यातना के अन्य प्रकारों को सीमित नहीं करती है| फिलिपींस की आबादी मात्र 9 करोड़ है जिसमें इतने अच्छे कानून के ज्ञाता लोग हैं जितने भारत की 125 करोड़ की आबादी में भी उपलब्ध नहीं हैं| इससे न केवल देश में विधि के ज्ञान बल्कि लोगों की संवेदनशीलता, गहन चिंतन और विधि के विषय में शोध  के स्तर का भी पता चलता है| यह भी संकेत मिलता है कि देश का विधि व्यवसाय ज्ञान और शोध के स्थान पर अन्य आधारों पर संचालित है| 
    
वकीलों का मुख्य-कार्य तकनीकी बारीकियों के आधार पर मामले उलझाकर उन्हें लंबा खेंचना है| इसी तथ्य को ध्यान में रखकर परिवार न्यायालयों में वकीलों के माध्यम से पैरवी की मनाही है| श्रम आयुक्तों के यहाँ भी वकील की अनुमति नहीं है| बहुत से राज्य सूचना आयोगों ने भी वकील के माध्यम पैरवी को प्रतिबंधित कर रखा है|
प्रायः वकालतनामों में शर्त होती है कि कि यदि किसी तारीख पेशी पर वकील साहब उपस्थित नहीं हुए और कोई प्रतिकूल आदेश पारित हो गया तो यह दायित्व भी मुवक्किल का ही होगा क्योंकि वकालतनामें में मुवक्किल द्वारा  यह भी परिवचन (अंडर्टेकिंग) दी जाती है कि वह हर तारीख पेशी पर हाजिर होगा| अधिकांश वकालतनामों में यह भी लिखा होता है कि देरी के लिए हर्जा खर्चा देना पड़ा तो मुवक्किल देगा और प्राप्त होने पर यह माल वकील साहब का होगा| विडम्बना यह है कि हमारे कानूनविदों ने अभी तक वकालतनामें का कोई मानक प्रारूप निर्धारित नहीं किया है और वकीलों और भूतपूर्व वकीलों(न्यायाधीशों) के मध्य यह दुरभि संधि चली आरही है| वैसे विलम्ब से प्रायः प्रार्थी पक्ष को हानि होती है अतः इसके लिए मिलने वाली क्षतिपूर्ति पर पक्षकार का ही अधिकार बनता है| सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 35 ख में भी यह प्रावधान है कि विलम्ब के लिए पक्षकार को क्षतिपूर्ति दी जायेगी| किन्तु इसके बावजूद वकालतनामें में विधिविरुद्ध प्रावधान रखे जाते हैं और हमारी विकलांग न्याय व्यवस्था मूक दर्शक बने यह सब देखती  रहती  है|


यहाँ यह उल्लेख करना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपनी वेबसाइट पर वकालतनामें का प्रारूप दे रखा था उसमें भी वकीलों के लिए बहुत ही अनुकूल शर्तें हैं| इस वकालतनामें में कहा गया है कि दी गयी फीस वापिस नहीं होगी और यह फीस मात्र तीन वर्ष के लिए है व यदि मुक़दमा अधिक अवधि तक चला तो प्रत्येक अतिरिक्त तीन वर्ष की अवधि के लिए तयशुदा फीस की आधी फीस और दी जायेगी| इससे यह अहसास होता है कि भारत के न्यायालय वकीलों का पोषण करने के लिए बने हैं न कि जनता को न्याय देने के लिए| वैसे भी देश के न्यायाधीश जनता को न्याय के स्थान पर अक्सर तारीखें ही देते हैं| अब आप सोचें जब वकालतनामें में मुवक्किल के लिए ऐसी आत्मघाती शर्तें थोपी गयीं हों तो वकील साहब क्यों कर मुकदमें का जल्दी निपटान चाहेंगे| प्रश्न यह है कि मुवक्किल ने तो मुकदमे का निपटान करवाने के लिए वकील नियुक्त किया है न कि वकील को एक कमरे की तरह किराये पर लिया है ताकि अवधि के अनुसार उसे फीस/किराया देना पड़ेगा| सिद्धांततः वकील के दुराचरण के लिए बार काउन्सिल में शिकायत की जा सकती है और उपभोक्ता मंच में भी परिवाद पेश किया जा सकता है किन्तु बार काउन्सिल तो वकीलों का एक बंद क्लब मात्र ही है और उपभोक्ता मंच भी उसी प्रकार के एक न्यायाधीश द्वारा अध्याक्षित है जिन्होंने  ऐसा सुन्दर वकालतनामा अपनी वेबसाइट पर दे रखा है| मुवक्किलों को इनसे राहत की संभावनाएं नगण्य नहीं तो धूमिल अवश्य हैं|  अतः सावधान रहें ....

7 comments:

  1. आदरणीय महोदय इतनी बेबाक बात के लिए धन्यवाद.
    आप् जैसे महानुभाव जब न्यायासनोम को स्म्भालेम्गे जिनको क़ानून और देश हित की जानकारी है , तभी सही मायनों में देश आगे बढ़ेगा
    क्षेत्रपाल शर्मा

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  2. आपका ज्ञान हमारे लिए अत्यंत लाभदायक है ! मै माननीय श्रीमान विद्वान न्यायालयों का सम्मान करते (खौफ खाते) हुए आपको बता रहा हूँ की आपके शब्द सत्य की कसौटी पर कसे बिना माननीय श्रीमान विद्वान न्यायालयों की अवमानना है ! अत: कृपया हमें ज्ञान देते रहें लेकिन माननीय श्रीमान विद्वान न्यायालयों और भूतपूर्व विद्वान वकीलों (ओनोरेबल लर्नड योर लोर्डशिपों नयायाधिपतियों) पर टिप्पणियों से बचें !

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  3. The advocates have taken the entire justice on lease and they fleece the innocent and unsuspecting litigents people for a ride. Advocates and their cronies ask money on every step of the case and they do not do even any homework before the hearing. The advocasy of "adjournments" is the only rule they hseems to have learnt.

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  4. dhanayvad sir nyay vevastha kee aise hi pol kholte rahen

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  5. लेकिन सर, बचें कैसे। वकालतनामे पर मजबूरी में करने पड़ते हैं। ये तो आपने बताया कि सावधान रहें, लेकिन किया क्या जाए। विकल्प क्या है। जो आपने बताया वो बहुत सुंदर है।

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