Sunday, 31 July 2011

आपराधिक न्यायतंत्र की निष्क्रिय भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने सोमनाथ पुरी बनाम राजस्थान राज्य (1972 एआईआर एस सी 1490) में कहा है कि भा00सं0 की धारा 405 प्रथम घटक के रूप में किसी भी प्रकार सम्पति का सौंपना या अखतियार प्रदान करना आपराधिक न्यास भंग के लिए आवश्यक बनाती है। शब्द किसी भी प्रकार सेइस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जब तक अभियुक्त को संपति पर कब्जा एक विशेष उद्देश्य या विशेष तरीके से व्यवहार करने के लिए अभियुक्त से अलग व्यक्ति में स्वामित्व रखते हुए दिया जाय तो यह कहा जा सकता है कि उसे सम्पति स्वामी के लाभ के लिए सौंपी गई थी। धारा 409 में प्रयुक्त अभिव्यक्ति सौंपी गई विस्तृत अर्थ में है और सभी मामले जिसमें विशेष उद्देश्य के लिए सम्पति स्वैच्छिक रूप से सौंपी गयी हो और जिन शर्तों पर कब्जा दिया गया था उनसे विपरीत बेईमानीपूर्वक निपटान कर दिया गया हो। एक व्यक्ति जब दूसरे की ओर से धन संग्रह करने के लिए अधिकृत है तो उसकी ओर से दिये जाने वाले का उस धन पर कोई स्वामित्व हित नहीं है। लेकिन जिसकी तरफ से राशि संग्रहित की गई वह उसको धन सौम्पते ही मालिक बन जाता है। रकम यात्रियों द्वारा अभियुक्त को इस प्रकार नहीं दी गई किन्तु इण्डियन एयरलाईन्स कॉरपोरेशन को दी गई और जैसे ही रकम प्राप्त हुई और उसकी रसीद यात्री को दी गई उसे रकम सौंप दी गई उसका बाद का आचरण जिसमें प्रतिपर्ण में मिथ्याकरण किया गया। उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के अधीन आपराधिक न्यास भंग के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 5 (2) के साथ-साथ 5 (1) सी दोषी  बनाती है।
फलकशेर बनाम राजस्थान राज्य (1978 क्रि.ला.रि. राज 613) में राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा है कि यह निःसंदेह ठीक है कि संज्ञेय अपराध के मामले में एफआईआर यथाशीघ्र दर्ज कराई जानी चाहिए और जहां रिपोर्ट कराने में देरी होती है वहां इसका रंगीन कथन, सोची समझी कहानियां, तोड़े-मरोड़े गये तथ्य और उनमें से कुछ झूठा गवाह दिखाया जाना और कुछ निर्दोष  लोगों को फंसाना  और उन्हें दोषी ठहराना प्रभाव है । इसी कारण से न्यायालय ने तुरन्त रिपोर्ट लिखाने और निकटतम मजिस्ट्रेट को तुरन्त प्रति भेजने पर बल दिया है ।दी गई परिस्थितियों के मद्देनजर मजिस्ट्रेट को एफआईआर 24 घण्टे के बाद भेजी गई। अतः सोची समझी गई कहानी की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

(लेखकीय टिपण्णी :एफ आई आर में विलम्ब के सम्बन्ध में भारतीय न्यायालयों का उक्त दृष्टिकोण दोषपूर्ण  है क्योंकि मात्र एफ आई आर दर्ज हो जाने से ही न्याय हित को क्षति नहीं पहुँच जाती है| एफ आई आर तो मात्र परिवादी का एक कथन है जिसके आधार पर किसी को सजा नहीं हो सकती है |सजा के लिए तो तथ्यों का प्रमाणित होना आवश्यक है | वैसे भी एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में दर्ज होने वाली एफ आई आरों में से मात्र १.५% में ही सजाएँ  होती हैं |यदि कहानी झूठी हो हो तो न्यायालयों के पास दण्ड एवं क्षतिपूर्ति के दोनों उपचार हैं| मात्र विलम्ब के कारण किसी मामले को निरस्त करना नवजात शिशु के वध के समान है| पुलिस द्वारा कितनी जल्दी एफ आई आर दर्ज की जाती है इससे न्यायाधीश (भूतपूर्व वकील) अनभिज्ञ नहीं हैं| स्वयं मजिस्ट्रेट भी महीनों तक परिवाद ( बाबूलाल बनाम राजस्थान) को लटका देते हैं | मजिस्ट्रेट के माध्यम से भेजे गए परिवादों में भी महीनों बाद एफ आई आर दर्ज होती हैं और स्वयं न्यायालय कोई सम्यक अनुवर्ती कार्यवाही करने के स्थान बेबस मूकदर्शक बने रहते हैं| जब देश के मजिस्ट्रेटों और पुलिस की यह स्थिति हो तो .... परिणति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है |एफ आई आर दर्ज होने के बाद पुलिस को तुरंत घटना स्थल पर जाकर साक्ष्य एकत्रित करना चाहिए ताकि साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो किन्तु अनुसन्धान एवं परीक्षण में प्राय इतना विलम्ब होता है कि पक्षकार मामले को भूल जाते हैं अथवा महत्वपूर्ण साक्ष्य तब तक उपलब्ध नहीं रहते| परीक्षण पूरा न होने तक पक्षकार न्यायिक प्रक्रिया के बंधक बने रहते हैं यह  बात  न्यायालयों की अंतरात्मा को भी झकझोर नहीं पाती है| न्याय का आतंक नहीं अपितु मानवीय चेहरा होना नितांत आवश्यक है यह स्मरणीय है|)




क्या आपको ज्ञान है कि कई बार जब न्यायालय में कोई जमानत आवेदन नहीं आता तो अक्सर न्यायधीश और उनका स्टाफ उदास हो जाता है |

Saturday, 30 July 2011

लोकपाल क्या कर लेगा ...?

लोकपाल के मुद्दे पर देश में अंधी बहस छिड़ चुकी है और मैं समझता हूँ कि इस समस्या की जड का शायद या तो इन लोगों को सम्यक ज्ञान नहीं है अथवा वे इसे स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करने में घबराते हैं | देश में अन्य अपराधियों  के समान भ्रष्टाचारियों  को भी दण्डित करने के लिए अनुसंधान एजेंसी एवं न्यायालय स्थापित हैं | अलबता भ्रष्टाचार के मामलों के लिए अलग से विशेष जांच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो , भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ,इंटेलीजेंस विभाग , सतर्कता आयोग आदि देश में कार्यरत हैं और इन मामलों के परीक्षण के लिए विशेष न्यायलय भी कार्यरत हैं | भ्रष्टाचार रोक थाम अधिनियम की धारा19 में यह प्रावधान है कि भ्रष्टाचार संबंधिंत किसी भी मामले में सुनवाई में न्यायालय द्वारा  रोक नहीं लगायी जावेगी और हमारा उच्चतम न्यायालय सत्यनारायण शर्मा के मामले में इस प्रावधान को पुष्ट  भी कर चुका है | किन्तु न्यायालयों द्वारा इसकी अनुपालना की वास्तविकता पर मैं कोई टिपण्णी करने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ |

यह निर्विवादित तथ्य है कि भ्रष्टाचारियों के मामलों में न तो अनुसन्धान उचित रूप से होता है और न ही न्यायालयों द्वारा उनका परीक्षण कानून सम्मत ढंग से होता है| हमारी सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार से संक्रमित है| हमारे संविधान निर्माताओं की सबसे बड़ी भूल यह रही है कि उन्होंने न्यायपालिका को देवीय स्थान देकर उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया | भ्रष्टाचार के मामले बढ़ने का सीधासा अर्थ यह है कि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा अच्छे कानून लागू कर निर्णय नहीं दिया जा रहा है| यदि इन मामलों का अच्छे न्यायधीशों द्वारा निस्तारण किया जाये तो स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता है |लोकपाल की आवश्यकता इसलिए अनुभव की जा रही है कि न्यायालयों द्वारा भ्रष्टाचारियों को दण्डित नहीं किया जा रहा है |
एशियाई मानवाधिकार आयोग के शब्दों में भारत में अधिकांश लोक अभियोजक कार्यालय ऐसी दलाली के कार्यालयों की तरह कार्य करते हैं जहाँ पुलिस , बचाव के वकील और लोक अभियोजक के बीच अपवित्र लेनदेन संपन्न होते हैं| जब एक लंबी खरीद फरोख्त के बाद भ्रष्ट राजनेताओं की इच्छा और पसंद के अनुसार राज्य द्वारा अभियोजक नियुक्त किये जाते हों तो इसे बुरा नहीं माना जा  सकता | भारत में न्याय प्रदानगी निकाय की नींव को ही क्षति पहुँच चुकी है |यह निकाय भ्रष्टाचार और अक्षमता की बदबूदार नाली में रेंगता है . जो अधिकारी जन सामान्य के हितों की रक्षा करने के बहाने से कार्य ग्रहण करते हैं वे भी इस गंदी नाली में जहरीले साँपों की तरह जहर छोड़ते हुए  और अपनी शैतानी पूंछ हिलाते हुए  रेंगते हैं व आम नागरिक ,जो मात्र उनकी दया पर आश्रित होते हैं, का उपहास करते हैं |

हमारे यहाँ कानून निर्माण में अंग्रेजी पद्धति का  अनुसरण किया जाता है और हमारी व्यवस्था की भिन्नताओं को ध्यान नहीं रखा जाता है |इस सन्दर्भ में भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि और हमारे सामाजिकसांस्कृतिक ढांचे पर भी विचार करना समीचीन रहेगा| पाश्चत्य देशों में विवाह व परिवार कोई बंधन या दायित्व नहीं हैं| वहाँ एक औसत व्यक्ति अपने जीवन में ५-६ विवाह करता है और विवाह वहाँ एक आपसी किराये के अनुबंध के समान हैं | सेवानिवृति के बाद पेंशन का प्रावधान इसलिए रखा गया था कि एक लोक सेवक को सेवानिवृति के बाद जीवनयापन की चिंता  नहीं रहे और वह सेवाकाल के दौरान सेवानिवृति के बाद जीवनयापन के लिए भ्रष्ट साधनों से सम्पति संचित करने का प्रयास नहीं करे| हमारी संस्कृति में विवाह और परिवार एक बंधन हैं और एक शक्तिसंपन्न लोकसेवक अपनी आने वाली पीढ़ियों  के लिए सम्पति संचित करना चाहते हैं |


अब यदि लोकपाल बन गया और उनमें उचित अनुसन्धान हो भी गया तो मामलों का परीक्षण तो अंग्रेजी कानून पर आधारित इन न्यायालयों ने ही करना है जो कानूनन किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं| अतः यदि स्वयं न्यायपलिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाये तो लोकपाल बनाने का उद्देश्य ही समाप्त जो जायेगा क्योंकि भ्रष्ट न्यायधीशों को अभयदान मिल जायेगा और वे भ्रष्टाचारियों को निस्संकोच दोषमुक्त कर देंगे |
 भारत में बैंकिंग उद्योग में लोकपाल की अवधारणा 1995 में प्रारंभ हो गयी थी| अब विद्वान पाठक ही निर्णय करें कि लोकपाल के परिणामस्वरूप बैंकों के प्रति जन शिकायतें किस सीमा तक दूर हो गयी हैं|क्या जन  असंतोष के कारण आज भी बैंकों के विरुद्ध उपभोक्ता अदालतों  और न्यायिक न्यायालयों में काफी मुकदमे नहीं चल रहे हैं?मात्र निजी बैंकों द्वारा ही नहीं अपितु सार्वजनिक क्षेत्र के   बैंकों द्वारा नागरिकों के अनुचित शोषण के आज भी बहुत से मामले अखबरों में सुर्ख़ियों में रहते हैं|हमें यह स्पष्ट समझा लेना चाहिए कि लोकपाल कोई रामबाण नहीं है जो किसी भी समस्या का हल कर देगा|

दोषपूर्ण अनुसन्धान

सुप्रीम कोर्ट ने नवीनचन्द्र मजीठिया बनाम मेघालय राज्य (2001 क्रि.ला.रि. सु0को0 43) में कहा है कि संहिता निजी अनुसंधान एजेन्सी को मान्यता नहीं देती है। यदि कोई व्यक्ति ऐसी निजी एजेन्सी को किराये पर लेना चाहे तो वह अपनी निजी जोखिम व खर्चे पर कर सकता है किन्तु ऐसे अनुसंधान को कानून के अन्तर्गत अनुसंधान के रूप में मान्यता नहीं दी जायेगी। फिर भी बचाव द्वारा इस प्रकार का साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सकता है। पुलिस अनुसंधान आवश्यक रूप से राज्य द्वारा उपलब्ध कराये गये धन से सम्पन्न होने चाहिए। एक धनवान शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत में पुलिस को धन देकर अनुसंधान करवाया जाना संभव है। लेकिन एक गरीब व्यक्ति पुलिस को वितीय सहायता उपलब्ध नहीं करवा सकता। यह स्वीकृत वास्तविकता है कि जो बांसुरी के लिए चुकाता है वही आवाज निकालता है। इसके समान ही अर्थ यह है कि जो कोई खर्चे चुकाता है सामान्यतया इसका नियंत्रण भी रखेगा। हमारी संवैधानिक योजना में पुलिस और अन्य सांविधिक अनुसंधान एजेन्सियों को ऐसे व्यक्ति का भाड़े का टट्टू बनाना अनुमत नहीं है जो इसे वहन कर सकता हो। समस्त शिकायतें शिकायतकर्ता की वितीय स्थिति पर बिना ध्यान दिये समान रूप से सप्रसन्नता तथा समान सफाई से अनुसंधान की जायेगी। {अक्सर पुलिस अनुसन्धान के लिए वहाँ आदि साधनों की मान करती है उसी परिपेक्ष्य में यह निर्णय है }
सुप्रीम कोर्ट ने करनेल सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य (एआईआर 1995 एस सी 2472) में कहा है कि हमें स्वीकार करना चाहिए कि दोषपूर्ण अनुसंधान हमें चिन्तित क्षण दिये तथा यह सोचने पर कि अभियुक्त को पूर्वाग्रसित किया गया है हम लाल पीले हो गये । किन्तु नजदीक से संवीक्षा करने पर हम यह सोचने के लिए कारण पाते हैं कि अनुसंधान में बेचारे श्रमिक की कीमत  पर अभियोजन ने अभियुक्त को बचाने के लिए छिद्र छोड़ दिये। मात्र इसी आधार पर दोषमुक्त करना पीड़ित की पीड़ा में और वृद्धि करना होगा।

Friday, 29 July 2011

प्रसंज्ञान का विवेकाधिकार नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने ए.सी. अग्रवाल बनाम रामकली (1968 एआईआर 1) में कहा है कि धारा 190 (1) (बी) द0प्र0सं0 में मजिस्ट्रेट उसके ध्यान में लाये जाने पर संज्ञेय अपराध का प्रसंज्ञान लेने के लिए बाध्य है। संज्ञान ले सकता है शब्दों को इस संदर्भ में अर्थ है संज्ञान लेना चाहिए। उसे ऐसा करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है अन्यथा यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने रामनरेश प्रसाद बनाम झारखण्ड राज्य के निर्णय दिनांक 12.02.09 में कहा है कि दूसरी ओर उच्च न्यायालय ने ऐसी शक्ति को माना है अपने निर्णय को दो आधारों पर निर्भर रहते हुए (क) जहां ऐसी रिपोर्ट पुलिस द्वारा प्रस्तुत की जाती है, अनुसंधान के पश्चात मजिस्ट्रेट को इसे न्यायिकतः व्यवहृत करना है जिसका अर्थ है कि यदि रिपोर्ट अस्वीकार की जाती है तो मजिस्ट्रेट पुलिस को उचित निर्देश दे सकता है और (ख) पुलिस द्वारा अनुसंधान के कार्य पर मजिस्ट्रेट को पर्ववेक्षण का कार्य दिया गया है और इसलिए मजिस्ट्रेट में ऐसी शक्ति राज्य बनाम मुरलीधर गोवर्धन तथा रामनन्दन बनाम राज्य के द्वारा मानी गयी है।
के. शंकरैया बनाम आन्ध्रप्रदेश राज्य (1983 क्रि.ला.ज. 1296) में कहा गया है कि उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मजिस्ट्रेट एक अपराध का प्रसंज्ञान ले सकता है यदि वह निष्कर्ष निकालता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है। फिर भी यदि वह रिपोर्ट या सूचना में यह पाता है कि विषशय-वस्तु पर्याप्त नहीं है तो वह मामला पुलिस अनुसंधानार्थ भेज सकता है और यदि अनुसंधान पर फिर भी विषय वस्तु अपर्याप्त हो तो तब भी मामले का प्रसंज्ञान ले सकता है और धारा 190 (1) (सी) ( स्वयं के ज्ञान अथवा अन्यथा सूचना मिलने पर द्धमें निर्धारित प्रक्रिया; अन्य मजिस्ट्रेट को स्थानंतरित करना ) का अनुसरण कर सकता है। ऐसे लोग हैं जो मजिस्ट्रेट को धारा 190 (1) (ए) के अन्तर्गत शक्तियों के प्रयोग हेतु सूचना देने को तैयार हैं। अनुसंधान प्रक्रिया मजिस्ट्रेट से सोच समझकर ली गई है चूंकि यह मुख्यतया पुलिस का मामला है।

Thursday, 28 July 2011

यह भी जानें

क्या आप जानते हैं कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा २ (घ) में परिवाद की दी गयी परिभाषा  के अनुसार मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किये जाने की दृष्टि से लिखित या मौखिक में किये गए अभिकथन से है कि किसी व्यक्ति ने , चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात , अपराध किया है | किन्तु व्यवहार में मजिस्ट्रेट मौखिक परिवाद पर कार्यवाही नहीं करते हैं |इसी प्रकार प्रसंज्ञान अपराध का लिया जाता है न कि अपराधी  का किन्तु मजिस्ट्रेट एवं पुलिस अज्ञात ( अपराधी के) नाम की सूचना देने पर कार्यवाही नहीं करना चाहती है |दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा ४४ (२) के अनुसार कोई मजिस्ट्रेट किसी भी समय अपनी स्थानीय अधिकारिता के भीतर किसी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है जिसकी गिरफ़्तारी के लिए वह उस समय और उन परिस्थितियों में वारंट जारी करने के लिए सक्षम है | राजस्थान में सामान्य नियम (दाण्डिक) में यह प्रावधान किया गया है कि मजिस्ट्रेट बिना पूर्वानुमति के मुख्यालय नहीं छोडेगा और वह हर समय उपलब्ध रहेगा | अन्य राज्यों में भी लगभग समानांतर प्रावधान हैं |आपराधिक न्याय तंत्र में पुलिस पहिये हैं तो मजिस्ट्रेट उसकी धुरी है |हमारी संसद का भी मंतव्य इस सन्दर्भ में बड़ा स्पष्ट रहा है और उसने दण्ड प्रक्रिया संहिता में एकल शब्द मजिस्ट्रेट प्रयोग किया है और कहीं भी मजिस्ट्रेट न्यायालय शब्द का प्रयोग नहीं किया है| जबकि इसके विपरीत सिविल प्रक्रिया संहिता में न्यायालय शब्द का प्रयोग  किया गया है| एक लोक सेवक मजिस्ट्रेट हमेशा ड्यूटी पर रहता है जबकि न्यायालय के लगने का निर्धारित समय है |

यह स्पष्ट है कि कानून में गिरफ़्तारी आदि के लिए जिस प्रकार पुलिस शब्द प्रयोग किया गया है न कि पुलिस थाने का उसी प्रकार मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात गिरफ़्तारी करने , जमानत लेने , प्रसंज्ञान लेने आदि कार्य, यथा स्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायधीश कभी भी कर सकता है उसके लिए न्यायालय लगा होना आवश्यक नहीं है | दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 (१) के अनुसार न्यायालय किसी ऐसी चीज या दस्तावेज जिसे पेश किया जाना आवश्यक या वांछनीय है तो उसे पेश करने के लिए आदेश जारी कर उसे पेश करने के लिए या उपस्थित होकर पेश करने के लिए आदेश जारी कर सकता है| किन्तु अनुसंधानकर्ता पुलिस अधिकारी रुचिहीन प्रकरणों में लंबे समय तक कार्यवाही नहीं करते और मजिस्ट्रेटों द्वारा भी उनके विरुद्ध इस धारा के अंतर्गत कोई कार्यवाही नहीं की जाती है | मात्र अपने अहम की तुष्टि के लिए आपवादिक प्रकरणों में ही पुलिस के विरुद्ध इस धारा की शक्तियों का प्रयोग किया जाता है जिससे पुलिस अपने आपको सर्वोपरि समझती रहती है और कानून का उल्लंघन करने का उसका दुस्साहस बढता रहता है |
पाश्चात्य देशों में जमानत को अधिकार बताया गया है किन्तु हमारे यहाँ तो धन खर्च करके स्वतंत्रता खरीदनी पड़ती है | उत्तर प्रदेश में तो सत्र न्यायाधीशों द्वारा अग्रिम जमानत लेने का अधिकार ही दिनांक ०१.०५.१९७६ से छीन लिया गया है और इस लोक तंत्र में स्वतंत्रता के अधिकार को  एक फरेब व मजाक बनाकर रख दिया है |एक तरफ भारतीय कानून के अनुसार एक व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि उसे उचित अन्वीक्षण में दोषी नहीं पा  लिया जाता है तथा दोष सिद्ध व्यक्ति को भी सदाचार के वचन पर परिवीक्षा पर छोड़ा जा  सकता है  व दूसरी ओर एक अन्वीक्षण के  अधीन  अभियुक्त, जिसे दोषी नहीं ठहराया  गया हो, को भी जमानत से इंकार कर दिया जाता है| यहाँ तक कि एक अभियुक्त को राजीनामे द्वारा लोक अदालत में भी मुक्ति दे दी जाती है| इस मायाजाल से जमानत के पीछे छिपे रहस्य को समझा जा सकता है| यह देखा गया है कि कई बार जब न्यायालय में कोई जमानत आवेदन नहीं आता तो न्यायधीश और उनका स्टाफ उदास हो जाता है | यह भारत में न्यायिक दुष्चक्र है |

एफ आई आर -वर्दी का प्राथमिक कर्त्तव्य कानून व्यवस्था बनाये रखना तथा नागरिकों की रक्षा करना

एफ.आई.आर. के मामले पर विस्तृत विवेचना करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुलदीप सिंह बनाम राज्य (1994 क्रि.ला.ज. 2502 दिल्ली) में कहा है कि यदि यह पुलिस के विवेक पर छोड़ दिया जावे कि संज्ञेय अपराध के किस मामले में वह पहले जांच करेगी और तब दर्ज करने या नहीं करने का निर्णय करेगी तो इससे अपराध दर्ज करने में विलम्ब होगा और इस बीच महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध नहीं रहेगा। स्वयं जांच में लम्बा समय लग सकता है और तब इस प्रारम्भिक जांच को भी चुनौति दी जा सकती है। पुलिस को संज्ञेय मामले मे भी अपराध दर्ज न करने की शक्ति देना और इसके बजाय प्रारम्भिक जांच कर बाद में दर्ज करने से मना करने का प्रभाव यह होगा कि मामला न्यायिक जांच से हमेशा के लिए वंचित हो जायेगा, संहिता में ऐसा नहीं माना गया है। नियम न तो संवैधानिक प्रावधानों पर अभिभावी हो सकते और न ही अधिनियमों के उल्लंघन में कोई प्रभाव रख सकते हैं। पुलिस को संज्ञेय अपराध को दर्ज करने या न करने का अनियंत्रित एवं पूर्ण विवेकाधिकार देना संविधान में वर्णित समानता के अनुच्छेद का उल्लंघन है। संहिता में न्यायपालिका को पुलिस के विवेकाधिकार को नियंत्रण का अधिकार है। यद्यपि पुलिस को अनुसंधान नहीं करने का अधिकार है किन्तु वह भी न्यायिक नियंत्रण के अध्यधीन है।
एक मजिस्ट्रेट जब भी एक परिवाद पर पुलिस को अनुसंधान का निर्देश देता है तो पुलिस को परिवाद को एफआईआर समझते हुए संज्ञेय मामला दर्ज करना होता और पुलिस नियमों की अनुपालना करनी होती है। वास्तव में यदि मजिस्ट्रेट निर्देश न भी तो भी धारा 156 (1) के मद्देनजर जो कि पुलिस को संज्ञेय मामले में अनुसंधान के लिए अधिकृत करती है और पुलिस अधिनियम 1884 के अन्तर्गत बनाये गये नियमों में पुलिस मामला दर्ज करने के लिए और अनुसंधान के लिए कर्तव्य बाध्य है।
इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने इन्द्रसिंह बनाम पंजाब राज्य (1995 3 एससीसी 702) में कहा है कि जो वर्दी में हैं उनका प्राथमिक कर्त्तव्य कानून व्यवस्था बनाये रखना तथा नागरिकों की रक्षा करना है। केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी बेसहारा दर्शक की तरह नहीं रह सकता। जब एक राज्य का पुलिस बल पंजाब पुलिस के नाम पर कार्य करता है तो जिस राज्य के अंग के रूप में वह कार्य कर रहा है उसे परिणाम भुगतान चाहिए। उसे चाहिए कि वह जब कानून और व्यवस्था को लागू करने में विफल होता है तब ऐसी विफलता के परिणामस्वरूप नागरिकों को क्षतिपूर्ति प्रदान करे। बाद में जब दोषियों का पता लग जावे तो राज्य को उनसे वसूली करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि वह करदाताओं का धन है। उपमहानिरीक्षक, पुलिस कप्तान एवं अन्य सभी दोशी लोगों जिन्होंने शिकायत दर्ज करने से मना किया की पहचानकर उनके विरूद्ध अनुशासनिक कार्यवाही अवश्य की जानी चाहिए।
पुलिस द्वारा संज्ञेय मामले में भी प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से मना करने के प्रमुख मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने लक्ष्मी नारायण गुप्ता बनाम कमीश्नर पुलिस (बीओ (2006) डीएलटी 490) के निर्णय में स्पष्ट किया है कि इस बात पर बल देने की आवश्यकता नहीं है कि यह पुलिस अधिकारी की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता कि वह अन्वीक्षण न्यायालय की भूमिका अदा करे और सूचितकर्ता की सूचना के सार और गुणावगुण के निर्णय के ऊपर बैठ जाये। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 (1) के अन्तर्गत पुलिस अनुसंधान नहीं करने का निर्णय कर सकती है। पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि उसे दी गई किसी संज्ञेय अपराध की किसी सूचना को दर्ज करने से मना कर दे और इसके स्थान पर पहले जांच करे और परिणामस्वरूप प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दे। यदि इस बात का निर्णय करने पुलिस पर छोड़ दिया जावे कि किन मामलों में वह पहले प्राथमिक जांच करेगी तथा उसके बाद दर्ज करेगी या मना करेगी तो अपराधों के दर्ज होने में विलम्ब होगा तथा इस बीच महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध नहीं रहेगा। प्राथमिक जांच अपने आप में लम्बा समय ले सकती है। तत्पश्चात इस जांच को भी चुनौती दी जा सकती है।

Wednesday, 27 July 2011

एफ आई आर में आनाकानी

पुलिस अक्सर एफ.आई.आर. दर्ज करने में आनाकानी करती है, विभिन्न बहाने गढ़ती है। यद्यपि कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि क्षेत्राधिकार या किसी भी अन्य मुद्दे को लेकर पुलिस एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। यहां तक कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 155 तथा राजस्थान पुलिस नियम 1965 के नियम 5.1 में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि मामला असंज्ञेय अपराध का है तो भी रोजनामचा में प्रविष्टि की जायेगी किन्तु व्यवहार में पुलिस तो संज्ञेय मामलों में भी अपराध दर्ज नहीं करती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 में यह प्रावधान है कि यदि प्रभारी पुलिस थाना एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना करे तो जिला पुलिस अधीक्षक को लिखित में सूचना देकर एफ.आई.आर. दर्ज करवायी जा सकती है। वैकल्पिक रूप में धारा 190, 200 या 156 के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट न्यायालय में भी आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। अक्सर नागरिकों को पुलिस द्वारा यह कहा जाता है कि थाना प्रभारी बाहर गये हुए हैं अतः उनके आने पर एफ.आइ.आर. दर्ज की जावेगी। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि प्रभारी अधिकारी हमेशा थाने पर उपलब्ध रहता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (ण) में हैड कांस्टेबल स्तर तक का पुलिस अधिकारी थाना प्रभारी हो सकता है। राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के नियम 3.8 में कहा गया है कि पुलिस थाना लिपिक पुलिस थाना छोड़कर बाहर नहीं जायेगा। नियम 3.64 में लिपिक का कर्त्तव्य उच्च अधिकारियों की अनुपस्थिति में प्रभारी के तौर पर इस प्रकार कार्य करना बताया गया है ।थाना प्रभारी का पद कभी खाली नहीं रहता अतएव इस आधार पर पुलिस कभी भी एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। एफ.आई.आर. दर्ज करने मात्र से ही किसी पक्षकार को कोई क्षति नहीं पहुंचती और न ही एफ.आई.आर. दर्ज करते ही अभियुक्त को गिरफ्तार करना आवश्यक है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग की तीसरी रिपोर्ट के अनुसार 60 प्रतिशत गिरफ्तारियां अनावश्यक तथा भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत है जिन पर जेलों पर होने वाले व्यय का 43.2 प्रतिशत भाग व्यय किया गया है।
राजस्थान पुलिस अधिनियम 2007 की धारा 31 में कहा गया है जहां एक व्यक्ति जिला पुलिस अधीक्षक को सूचना देता या भेजता है जो कि प्रथम दृश्टया संज्ञेय अपराध का गठन करती है और यह आरोपण करता है कि क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थानों के प्रभारी ने सूचना दर्ज करने से मना कर दिया है तो जिला पुलिस अधीक्षक ऐसे पुलिस या प्रभारी के विरूद्ध तुरन्त अनुशासनिक कार्यवाही  करेगा अथवा करवायेगा ।
राजस्थान पुलिस नियम, 1965 के नियम 6.10 में कहा गया है कि अपराध की सूचना मिलने पर तुरन्त एक पुलिस ऑफिसर घटनास्थल के लिए रवाना होगा और मामले से सम्बन्धित तथ्यों का संग्रहण करेगा ताकि गड़बड़ी को रोका जा सके।
विभिन्न संवैधानिक न्यायालयों ने भी एफ.आई.आर. सम्बन्धित प्रावधानों की निम्नानुसार व्याख्या की है। हिमाचल उच्च न्यायालय ने मुन्नालाल बनाम राज्य (1992 क्रि.ला.ज. 1558 हि.प्र.) में कहा है कि पुलिस के पास एफ.आई.आर. दर्ज करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है और उसके बाद अनुसंधान प्रारम्भ होता है। गुजरात उच्च न्यायालय ने जयन्तीभाई लालू भाई पटेल बनाम गुजरात राज्य (1992 क्रि.ला.ज. 2377 गुजरात) के मामले में कहा है कि अभियुक्त के विरूद्ध एफ.आई.आर. दर्ज कर उसकी एक प्रति संहिता के प्रावधानों के अनुसार मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है। एफ.आई.आर. ऐसा सार्वजनिक दस्तावेज है जिस पर दं.प्र.सं. की धारा 162;(हस्ताक्षरित न होना और साक्ष्य में काम में न लेना) लागू नहीं होती।

Tuesday, 26 July 2011

जमानत का कानून

सुप्रीम कोर्ट ने कल्याण चन्द सरकार बनाम राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (2004 (07, एससीसी 528) में कहा है कि जमानत देने या मना करने का कानून निश्चित है। न्यायालय को जमानत देते समय अपने विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिकतः करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने रविन्द्र सक्सेना बनाम राजस्थान राज्य के निर्णय दिनांक 15.12.09 में कहा है कि चूंकि जमानत से मनाही व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित करती है। न्यायालय को धारा 438 के प्रतिबन्धों के लगाये जाने के विरूद्ध झुकना, विशेषतः तब जबकि विधायिका ने इस धारा में ऐसे कोई प्रतिबन्ध  नहीं लगाये तो, चाहिये। धारा 438 व्यक्ति की स्वतन्त्रता से सम्बन्धित एक प्रक्रियागत प्रावधान है जो कि इस बात का लाभ पाने का अधिकारी है कि वह निर्दोष, क्योंकि वह आवेदन की तिथि को जिस अपराध के लिए जमानत मांग रहा है का, दोषसिद्ध नहीं है। ऐसे प्रतिबन्ध एवं शर्तें जो धारा 438 में नहीं उसे संवैधानिकतः जोखिमपूर्ण बनाते हैं क्योंकि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को अनुचित प्रतिबन्धों की अनुपालना के अधीन नहीं किया जा सकता। धारा 438 के लाभप्रद प्रावधान को बचाया जाना चाहिये न कि उसे फेंका जाना चाहिये। धारा 438 जिस रूप में है जिसे कि विधायिका ने सोचा समझा है किसी भी आधार जो अन्य अनुचित एवं अन्यायपूर्ण हो के अपवाद के लिए खुली है। हमें ऐसे शब्दों,जो कि इसमें नहीं है, के पठन से इसे किसी भी संवैधानिक चुनौति से बचाना चाहिए ।

Monday, 25 July 2011

जमानत एवं तलाशी के अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने खिलाड़ी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के निर्णय दिनांक 23.01.2009 में कहा है कि जमानत प्रार्थना पत्र व्यहरित करते समय विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायिक तरीके से करना चाहिये न कि एक सामान्य बात के तौर पर।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात राज्य बनाम लालसिंह किशन सिंह (1981 एआईआर एससी 368) में कहा है कि पुलिस कमीशनर या पुलिस अधिकारी जो कि उसकी तलाशी, गिरफ्तार करने और अनुसंधान करने के लिए अधिकृत है वह धारा 496 के प्रावधानों के अन्तर्गत अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने के कानूनी दायित्वाधीन है। इस प्रकार वारंट के निष्पादन में गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने का अधिकार कानून में है और परिणाम स्वरूप कोई भी कार्यपालक निर्देश कानूनी प्रावधान के विपरीत नहीं चल सकता।

पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने गुरूबक्ष सिंह सीबिया बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1978 पंजाब 1) में कहा है कि कोई भी दो मामले के तथ्य समान नहीं हो सकते इसलिए न्यायालयों को थोड़ी सी आजादी दी गई है ताकि विवेकाधिकार देना अर्थपूर्ण हो सके। सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय को अग्रिम जमानत देने में पर्याप्त विवेकाधिकार देना जोखिमपूर्ण नहीं है क्योंकि प्रथमतः यह अनुभवी व्यक्तियों वाले बड़े न्यायालय हैं और दूसरा इनके आदेश अंतिम न होकर अपील या पुनरीक्षा की संवीक्षा के अधीन है। सर्वोपरि यह है कि विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायालयों द्वारा न्यायिकतः करना होता है और किसी उन्माद या कल्पना पर आधारित नहीं दूसरी ओर अग्रिम जमानत दी जा सकती है क्योंकि जीवन में अप्रत्याशित संभावनायें और नई चुनौतियां होती हैं। न्यायिक विवेकाधिकार को इतना मुक्त होना चाहिये कि इन संभावनाओं के विस्तार को समा सके और इन चुनौतियों का मुकाबला कर सके।

Sunday, 24 July 2011

जमानत के सिद्धांत

एक तरफ भारतीय कानून के अनुसार एक व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक कि उसे उचित अन्वीक्षण में दोषी नहीं पा  लिया जाता है तथा दोष सिद्ध व्यक्ति को भी सदाचार के वचन पर परिवीक्षा पर छोड़ा जा  सकता है  व दूसरी ओर एक अन्वीक्षण के  अधीन  अभियुक्त, जिसे दोषी नहीं ठहराया  गया हो, को भी जमानत से इंकार कर दिया जाता है |समान परिस्थितियों में एक न्यायाधीश द्वारा एक अभियुक्त को जमानत देने और दूसरे अभियुक्त को इंकार करने के विवेकाधिकार का प्रयोग करना संविधान के अनुच्छेद १४ का स्पष्ट उल्लंघन व मनमानापन है |

बम्बई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र राज्य बनाम तुकाराम शिवा पाटिल (1976 (18 बीओएमएलआर 411) में कहा है कि मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने निर्धारित किया है कि गैर जमानती अपराध के विषय में नियम यह है कि विशेष परिस्थितियों को छोड़ते हुए जमानत नहीं ली जानी चाहिए ताकि विरोधी प्रार्थना पत्र पर इस चरण पर न्यायालय यह देख सके कि क्या ये विशेष परिस्थितियां मौजूद है। मेरे विचार से आपराधिक मामले अन्वीक्षण करने वाले प्रत्येक मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश को अन्तर्निहित शक्ति है कि वह देखे कि अन्वीक्षा ठीक चल रही है और न्याय के उद्देश्य विफल नहीं हो रहे हैं और यदि उसके ध्यान में लाये गये तथ्यों से यह संकेत मिलता हो कि अन्वीक्षणाधीन व्यक्ति को गिरफ्तारी में नहीं लिया गया तो न्याय के लक्ष्य विफल हो जायेगे तो न्यायालय को उसकी गिरफ्तारी निर्देशित करने का अन्तर्निहित अधिकार है। वर्तमान मामले में विद्वान मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट था कि अभियुक्त अभियोजन साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर रहा था और अपराध की पुनरावृति को रोकने के लिए विद्वान मजिस्ट्रेट अभियुक्त की पुनः गिरफ्तारी के लिए आदेश का अधिकारी था चाहे उसे जमानत के आदेश पर छोड़ा गया तो यह कोई उतर नहीं है कि विद्वान सत्र  न्यायाधीश ने जैसा कि कहा कि इस आशय का आवेदन पत्र सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में दिया जाना चाहिये था क्योंकि यह न्यायालय तुरन्त आदेश देने के लिए आपात स्थिति में उपलब्ध नहीं होते चूंकि अभियुक्त को छोड़े हुए आठ महीने से अधिक बीत गये हैं इसलिए उसे पुनः अभिरक्षा में लेना वांछनीय नहीं होगा। क्योंकि धारा 167 पुलिस पर रिमाण्ड प्राप्त करने के 60 दिन के भीतर अनुसंधान करने का दायित्व डालती है और धारा 434 मजिस्ट्रेट पर 60 दिन के भीतर अन्वीक्षण पूर्ण करने को आवश्यक बताती है।

Saturday, 23 July 2011

चुप रहने का अधिकार एवं स्वतंत्रता

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह (1994 एआईआर 1872) में कहा है कि जंगसिंह बनाम हरियाणा राज्य (1988 (1 क्रि0 446 पंजाब) में कहा गया है कि तलाशी लेने वाले अधिकारी पर यह दायित्व है कि तलाश किये जाने वाले व्यक्ति को उसके इस अधिकार के विषय में जताये कि उसकी तलाशी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में ली जाये तथा ऐसा करने में विफलता उसकी दोषमुक्ति को उचित ठहराती है। कानून तोड़ने की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। इसी अवधि में कानून लागू करने वाले लोगों द्वारा शक्ति का दुरूपयोग करने के प्रति जागरूकता, न्यायिक एवं विधायन में ऐसे अधिकारियों पर प्रतिबन्धों को कड़ा करने, अभियुक्त प्रजाजन और साक्षीगण के अधिकारों की रक्षार्थ प्रबल इच्छाशक्ति बढ़ी है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अनुसंधान एजेन्सी को अधिनियम की धारा 15 की उपधारा (1) तथा (2) में समाहित प्रावधानों की पूर्ण अनदेखी नहीं करनी चाहिए। किन्तु यदि इन प्रावधानों की अनुपालना न की जाय तो सम्पूर्ण कार्यवाही एवं अन्वीक्षण दूषित या अवैध नहीं हो जाती। अपराध काफी समय पूर्व हुए बताये गये हैं और नोटिस के चरण पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद इतने समय बाद जबकि अधिकांश साक्ष्य गायब हो गये हैं हम इसे समीचीन नहीं समझते कि प्रकरणों में पुनः अन्वीक्षण की जाय। यदि अभिरक्षा में एक व्यक्ति से पूछताछ की जाती है तो उसे सर्वप्रथम स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में बताया जाना चाहिए उसे चुप रहने का अधिकार है। जो इस विशेषाधिकार से अनभिज्ञ हो उन्हें यह चेतावनी प्रारम्भिक स्तर पर ही बुद्धिमतापूर्वक दी जानी चाहिए। ऐसी चेतावनी की अन्तर्निहित आवश्यकता पूछताछ के दबावयुक्त वातावरण पर काबू पाने के लिए है। प्रत्येक कानून को खोलने की चाबी कारण और कानून की भावना है। कानून निर्माताओं का आशय कुल मिलाकर ध्यान देने योग्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने खड़कसिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963 एआईआर 1295) में कहा है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में परिस्थितियां बदलने के लिए घूमने फिरने की शक्ति एक व्यक्ति को जहां वह जाये वहां स्वतन्त्र रूप से बिना बाधा या कारागार के अनाजाना यदि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा न हो तो।
ए.के. गोपालन के मामले में कहा गया है कि स्वतन्त्रता का अर्थ भौतिक प्रतिबन्ध या बिना उत्पीड़न के शारीरिक स्वतन्त्रता से है। यह अभिव्यक्ति उसके बिना प्रतिबन्ध के रात्रि में विचरण से भी है। वैज्ञानिक तरीके से एक मनुष्य के दिमाग के वास्तविक प्रतिबन्ध जो कि उसके शारीरिक खतरे के भय को संभावित या प्रत्यासित करते हैं, शामिल है। इसलिए ऐसी दशायें उत्पन्न करना जो कि निवास को आवश्यक रूप से खतरा पहुंचाते हो और भय उत्पन्न करते हैं भौतिक प्रतिबन्ध कहे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार मात्र उसके विचरण पर प्रतिबन्ध से मुक्ति ही नहीं है अपितु उसके व्यक्तिगत जीवन में अतिक्रमण से मुक्त है। यह सही है कि हमारा संविधान निजता को स्पष्ट रूप से मूल अधिकार घोषित नहीं करता है। किन्तु यह अधिकार वैयक्तिक स्वतन्त्रता का आवश्यक अंग है। प्रत्येक लोकतांत्रिक देश घरेलू जीवन को मान्यता देता है जिससे अपेक्षा है कि उसे आराम, शारीरिक प्रसन्नता, मानसिक शांति और सुरक्षा दे। अंतिम, एक व्यक्ति का घर जहां वह अपने परिवार के साथ रहता है उसमें अतिक्रमण उसकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में दखल है।
लेखकीय टिपण्णी : इंग्लॅण्ड में चुप रहने का अधिकार व उसके परिणाम संसदीय कानून में सुपरिभाषित हैं |

Friday, 22 July 2011

गलती और हानि के लिए कानून में इलाज होना ही चाहिए

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एम.पी. द्विवेदी के अवमान प्रकरण (1996 क्रि.ला.ज. 1670) में यह बल दिया गया है कि हम घोषित कर निर्देश देते तथा नियम बनाते है कि कैदी के, जब उसे किसी कारागार में देश में कहीं रखा जाये या ले जाया जावे या एक जेल से दूसरे जेल या न्यायालय से जेल या वापिस ले जाया जाये, हथकड़ियां तथा बेड़ियां नहीं लगाई जायेगी चाहे वह दोष सिद्ध हो अथवा अन्वीक्षणाधीन । पुलिस और जेल अधिकारियों को देश में जेल में या परिवहन में अपने आप में हथकड़ी लगाने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं होगा। हमारे द्वारा जारी इन निर्देशों का किसी भी पुलिस या जेल के किसी भी पदधारी द्वारा उल्लंघन सारांशिक रूप में न्यायालय अवमान अधिनियम के अन्तर्गत दाण्डिक कानून के अतिरिक्त दण्डनीय होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बासु बनाम प0 बंगाल राज्य (1997 एससीसी 426) में पुनः कहा है कि गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान, यद्यपि सम्पूर्ण के दौरान नहीं, अपने वकील से मिलने दिया जाये अन्यथा उसे न्यायालय के अवमान के लिए दोषी ठहराया जावेगा और अवमान की कार्यवाही स्थानीय क्षेत्राधिकार वाले किसी भी उच्च न्यायालय में संस्थित की जा सकेगी। एक कानूनी न्यायालय अपनी चेतना एवं जीवन्तता को वास्तविकता से बन्द नहीं कर सकता। मात्र अपराधी को दण्ड पीड़ित परिवार को कोई ज्यादा सांत्वना नहीं दे सकता। कोई भी गलती बिना इलाज नहीं है। क्षतिपूर्ति के लिए सिविल कार्यवाही एक लम्बी एवं जटिल न्यायिक प्रक्रिया है। ऐसे परिवार जिसका कि रोजी रोटी कमाने वाले परिवार का सदस्य मृत्यु को प्राप्त हो गया हो तो मौद्रिक क्षतिपूर्ति द्वारा न्यायालय द्वारा नागरिक के जीवन के अविच्छिन्न अधिकार के हनन के लिए प्रदानगी उसके घावों पर मरहम लगाने के समान है । कानून चाहता है कि प्रत्येक मामले में जहां एक व्यक्ति ने गलती की है और हानि पहुंचाई है वहां इलाज हो। एक व्यक्ति जिसके जीवन का मूल अधिकार किसी कार्यवाही या अभिरक्षकीय हिंसा या लॉकअप में मृत्यु से कोई अर्थपूर्ण उपचार नहीं देती है किन्तु काफी कुछ करने की आवश्यकता है ।प्रत्येक अपराध की दशा में अपराधी का अभियोजन राज्य का कर्तव्य है लेकिन अपराध के शिकार को मौद्रिक प्रतिपूर्ति करना भी आवश्यक है। जहां मूल अधिकारों का हनन हुआ हो वहां न्यायालय मात्र घोषणा करके नहीं रूक सकता। गलत किये हुए की मरम्मत व कानूनी क्षति के न्यायिक उपचार दोनों न्यायिक अन्तरात्मा की विवशता है ।

Thursday, 21 July 2011

पुलिस आचरण एवं गिरफ़्तारी

राजस्थान पुलिस नियम १९६५ के नियम ६.१२ में उल्लेख है कि प्रत्येक मामले में सभी आदेश लिखित रूप में जारी किये जायेंगे जैसे गिरफ़्तारी का आदेश , तलाशी का आदेश, समन करके बुलाने का आदेश इत्यादि व उनको केस डायरी के साथ नत्थी किया जायेगा या उसकी अनुपस्थिति के कारणों का संतोषजनक रिकार्ड रखा जाएगा , किन्तु व्यवहार में पुलिस ये सभी कार्य बिना रिकार्ड के ही करती है और जनतांत्रिक कानूनों का न्यायालयों  के सामने खुला उपहास करती रहती है जिससे यह आभास मिलता है मानो न्यायालय पुलिस से ऊपर नहीं है अपितु पुलिस न्यायालय से ऊपर है, पुलिस के इन दुराचरणों का न्यायालय यह कहकर बचाव करते रहते हैं कि ये प्रक्रियागत नियम निदेशात्मक हैं आदेशात्मक प्रकृति के नहीं हैं जिनकी अनुपालना अनिवार्य नहीं है|
सुप्रीम कोर्ट ने जोगिन्दर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1994 एआईआर एस सी 1349) में कहा है कि कोई भी गिरफ्तारी महज इसलिए नहीं की जा सकती कि ऐसा करना पुलिस अधिकारी के लिए विधिपूर्ण है। एक व्यक्ति की गिरफ्तारी एवं पुलिस लॉक अप में निरूद्धीकरण उसकी ख्याति एवं आत्मसम्मान को अगणित हानि पहुंचाती है। किसी व्यक्ति के विरूद्ध अपराध करने के आरोप मात्र के कारण कोई गिरफ्तारी दैनन्दिक रूप में नहीं की जा सकती। एक पुलिस अधिकारी के लिए यह बुद्धिमतापूर्ण एवं उसके स्वयं के हित तथा नागरिक के संवैधानिक हित संरक्षण में होगा कि एक शिकायत की सद्भाविकता एवं सत्यता की जांच के पश्चात स्वयं तर्कसंगत संतुष्टि  और गिरफ्तारी की आवश्यकता और व्यक्ति की संलिप्तता के विषय में एक तर्क संगत विश्वास के बिना कोई गिरफ्तारी न करे । गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के तर्कसंगत विचार में ऐसी गिरफ्तारी आवश्यक एवं न्यायोचित होनी चाहिए। यदि पुलिस का एक अधिकारी एक व्यक्ति को पुलिस थाने उपस्थित होने तथा उसकी अनुमति के बिना स्थान नहीं छोड़ने का नोटिस देता है तो चलेगा, जधन्य अपराध को छोड़कर गिरफ्तारी टाली जानी चाहिए। डायरी में इस बात की प्रविष्टि की जावेगी कि गिरफ्तारी के विषय में किसे सूचित किया गया। ये सुरक्षार्थ शक्तियां  अनुच्छेद 21 तथा 22 (1) से उपलब्ध होगी तथा कड़ाई से अनुपालना की जावेगी। यह मजिस्ट्रेट का कर्त्तव्य होगा जिसके समक्ष गिरफ्तार व्यक्ति को प्रस्तुत किया जावे कि वह संतुष्ट हो कि इन आवश्यकताओं की अनुपालना की गई है।
बम्बई उच्च न्यायालय ने क्रिश्चीयन कम्यूनिटी वेलफेयर काऊंसिल बनाम महाराष्ट्र सरकार (1995 क्रि.ला.ज. 4223 बम्बई) में आगे स्पष्ट  किया है कि प्रत्येक तीसरे दिन निरूद्ध व्यक्ति की डाक्टरी जांच करवायी जानी चाहिए तथा ऐसी जांच रिपोर्ट पुलिस थाने की डायरी में दर्ज होनी चाहिए। यदि बन्दी व्यक्ति शिकायत लिखने के लिए कागज पेन मांगता है तो पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये जाने चाहिए। पुलिस थाने के प्रभारी को इस प्रकार शिकायतकर्ता बन्दी को मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत सहित प्रस्तुत करना चाहिए और सम्बन्धित मजिस्ट्रेट की गई शिकायत के मद्देनजर डॉक्टरी जांच, इलाज, सहायता जैसी न्यायोचित हो के लिए समुचित आदेश पारित करेगा। किसी भी महिला को महिला पुलिस की उपस्थिति बिना गिरफ्तार नहीं किया जावेगा और किसी भी स्थिति में सूर्यास्त के बाद व सूर्यास्त से पूर्व नहीं।

Wednesday, 20 July 2011

जनतान्त्रिक अधिकार: पुलिस अभिरक्षा एवं गिरफ़्तारी

जनतान्त्रिक अधिकार: पुलिस अभिरक्षा एवं गिरफ़्तारी: "सुप्रीम कोर्ट ने बालचन्द जैन बनाम मध्यप्रदेश राज्य ( 1977 एआईआर 366 ) में कहा है कि आपातकालीन परिस्थितियों में न्यायालय अग्रिम जमानत का ..."

व्यक्ति की गरिमा

बम्बई उच्च न्यायालय ने रविकान्त पाटिल बनाम महाराष्ट्र  राज्य (1991 क्रि.ला.ज. 2344 बम्बई) में कहा है कि याची को पूर्णतः अन्यायोचित उत्पीड़न और गरिमा हनन का शिकार बनाया गया जो कि भारत के किसी भी नागरिक को चाहे वह छोटे अपराध का या बडे़ अपराध का अपराधी हो, नहीं किया जा सकता, एक प्रतिबन्ध लगाने का कर्त्तव्य इस प्रकार के अवसर के रूप में नहीं होना चाहिए जिससे उत्पीड़न और सार्वजनिक उपहास हो। जीवन और स्वतन्त्रता अनुच्छेद 21 के संदर्भ में गरिमायुक्त स्वतन्त्रता तथा जीवन से है। स्वतन्त्रता का अर्थ गरिमाहीनता तथा उत्पीड़न से मुक्ति जो कि लोगों की अस्थाई अभिरक्षा प्राधिकारियों के हाथों में सौंपी जाय या देश  के कानून के अन्तर्गत सौंपी जाय है।
बम्बई उच्च न्यायालय ने प्रकाश  सीताराम सेलर बनाम महाराष्ट्र राज्य (1991 क्रि.ला.ज. 1251 बॉम्बे) में कहा है कि इस आरोपण पर भी याची समय का उल्लेख किये हुए जिसके दौरान उक्त गतिविधियां हुई कोई भी व्यक्ति तर्कसंगत बचाव नहीं रख सकता। यदि ये गतिविधियां दस वर्ष पूर्व हुई हो तो वह प्राधिकारियों को आसानी से समझा सकता है कि ये आसानी से शांत हो गई है और किसी भी निष्कासन के आदेश की आवश्यकता नहीं है। हमारा यह विचार है कि लोगों को पीटना और उनकी सम्पति को नुकसान पहुंचाना ये कुछ निराधार आरोप है। इस प्रकार का निष्कासन आदेश अवैध है और अपास्त करने योग्य हैं।
बम्बई उच्च न्यायालय ने अशाक हुसैन अल्लाह देथा उर्फ सिद्दिकी बनाम सहायक कलेक्टर (1999 क्रि.ला.ज. 2201 बम्बई) में स्पष्ट किया है कि अभियुक्त की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाने से गिरफ्तारी प्रारम्भ होती है न कि गिरफ्तारीकर्ता अधिकारी द्वारा दर्ज किये गये समय से। लेकिन पूछताछ या जांच में मदद के लिए कानून द्वारा अभिरक्षा अधिकृत नहीं है ।

Tuesday, 19 July 2011

पुलिस अभिरक्षा एवं गिरफ़्तारी

सुप्रीम कोर्ट ने बालचन्द जैन बनाम मध्यप्रदेश राज्य (1977 एआईआर 366) में कहा है कि आपातकालीन परिस्थितियों में  न्यायालय अग्रिम जमानत का अंतरिम आदेश  दूसरे पक्ष को नोटिस जारी किये बिना दे सकते है। धारा 438 में  अधिनियम में विधायिका का उद्देश्य स्पष्ट  है कि गैर जमानती अपराधों में लागू होता है कि जनता की स्वतन्त्रता का बनावटी आधारों पर गैर जिम्मेवार व्यक्तियों या अधिकारियों जो कि अभियोजन प्रभारी हो सकते हैं द्वारा हनन न हो। हम इसे तर्कसंगत समझते हैं कि विधायिका विरोधाभासी अधिनियमों को बनाये रखना नहीं चाहती और इसलिए ऐसा अर्थ स्वीकार किया जाना चाहिए जो कि दोनों विरोधाभास से बचे।
सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी (1999 3 एससीसी 141) में कहा है कि कानून सामान्यतया पुलिस अभिरक्षा के पक्ष नहीं  है। यदि किसी बाद के चरण पर और अधिक या गंभीर अपराध प्रकट हो तो प्रथम 15 दिन के बाद ऐसी स्थिति में भी पुलिस अभिरक्षा में निरूद्ध नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अरविन्दर सिंह बग्गा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1993 सप्ली (3 एसीसीसी 716) में कहा है कि हमने दोनों पक्षों के पैरोकारों को सुना है। जब याचिका दायर की गई थी लड़की पुलिस अभिरक्षा में थी। अब वह छोड़ दी गई है। किन्तु हमें भय है कि यह मामले का अन्त नहीं हो सकता इस बात के निर्धारण के लिए कि क्या याची को अवैध बन्दी बनाये जाने पर उसके अनुच्छेद 21 में मूल अधिकार के उल्लंघन के लिए रिट याचिका बन्दी प्रत्यक्षीकरण में आपराधिक या सिविल दायित्व जो कि सामान्य कानून से तय किया जा सकता है के अतिरिक्त सार्वजनिक कानून के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति का पात्र है।