Tuesday, 31 May 2011

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमा


सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेष राज्य बनाम विषन कुमार षिवचरण लाल के मामले में निर्णय दिनांक 05.12.08 में कहा है कि उच्च न्यायालय पर्यवेक्षण क्षेत्राधिकार के प्रयोग में मात्र निर्णय या आदेष या विच्छेपित कार्यवाही को निरस्त हीं नहीं कर सकता अपितु मामले के तथ्य और परिस्थितियां जो वाजिब ठहराये ऐसे निर्देष जारी कर सकता है कि निचला न्यायालय या ट्राईब्यूनल आगे इस प्रकार या नये सिरे से या जैसा उच्च न्यायालय निर्देष दे कार्यवाही करे । उपयुक्त मामलों में उच्च न्यायालय पर्यवेक्षण क्षेत्राधिकार के प्रयोग में इस प्रकार के विक्षेपित आदेष के स्थान पर अपना ऐसा निर्णय प्रतिस्थापित कर सकता है मानो कि निचले न्यायालय या ट्रायब्यूनल ने दिया हो। अन्तिम अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत क्षेत्राधिकार का प्रयोग व्यथित पक्षकार या उसकी ओर से प्रार्थना पर प्रयोग किया जा सकता है जबकि पर्यवेक्षिक क्षेत्राधिकार स्वप्रेरणा से प्रयोग किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भावेष जयन्ती लखाणी बनाम महाराश्ट्र राज्य के निर्णय दिनांक 07.08.09 में कहा है कि एक नागरिक का मौलिक अधिकार का जहां कहीं हनन होता है उच्च न्यायालय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत असाधारण षक्ति का ये ध्यान में रखते हुए कि न्याय तक पहुंच मानवाधिकार है, उसे दूर नहीं फेंकेगे। महज इसलिए कि एक रेड कॉर्नर नोटिस जारी हुआ है।
आन्ध्र प्रदेष उच्च न्यायालय ने जी.सुभाश रेड्डी बनाम आन्ध्र राज्य के मामले में कहा है कि लोक व्यवस्था लोक सुरक्षा तथा षान्ति के समानार्थी हैं। यह क्रान्ति, नागरिक युद्ध जैसी राज्य सुरक्षा को प्रभावित करने वाली अव्यवस्था का अभाव है।
भाशण और लोकव्यवस्था के बीच में तर्क संगत और नजदीक का सम्बन्ध होना चाहिए। राज्य का कर्त्तव्य है वह षांति बनाये रखना सुनिष्चित करने के लिए लोक व्यवस्था को खतरा न हो और उसके क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों के जीवन और स्वतन्त्रता की रक्षा करे। इसी प्रकार इस प्रकार के उपाय लागू करे कि राज्य और किसी व्यक्ति की अवैध गतिविधियांें को रोका जा सके। जिन लोगों को षांति और उनके जीवन को खतरे का अन्देषा हो। वे प्रथमतः जिला स्तर पर सक्षम अधिकारी तक पहुंच सकते हैं और षांति और सुरक्षा के लिए विषेश बल लगाने हेतु आवेदन कर सकते हैं। इस प्रकार के आवेदन पर सक्षम अधिकारी बिना देरी किये तुरन्त ही उपयुक्त आदेष करने के लिए कर्त्तव्यबद्ध है। कोई व्यक्ति जिसे अपने जीवन या सम्पति का सरकार या इसके नौकरों से भय है तो वह आपवादिक परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट न्यायालय में पहुंच सकता है जो कि उपयुक्त बॉण्ड के लिए आवष्यक निर्देष जारी कर सकेगा। यदि उसका आवेदन पत्र मना कर दिया जाता है तो वह ऐसे आदेष की पुनरीक्षा के लिए इस न्यायालय पहुंच सकता है।

Monday, 30 May 2011

भारतीय संविधान एवं लोकतान्त्रिक कानून



भारतीय संविधान दिनांक 26.01.1950 को लागू हो गया था किन्तु ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा बनाये गए कानूनों को अभी तक प्रतिस्थापित नहीं किया गया है | प्रत्येक प्रकार की  शासन प्रणाली व राजनैतिक व्यवस्था के अपने अलग सिद्धांत तथा विचारधारा होती है तथा उसके द्वारा बनाये  गए कानून  उसी प्रणाली के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं | हमारे संविधान के लोकतान्त्रिक प्रावधानों को मूर्त रूप देने  के लिए पुराने साम्राज्यवादी कानूनों व नए न्यायिक दृष्टान्तों की  समीक्षा कर नए कानून बनाये  जाने चाहिए थे |चूँकि हमारी कानून एवं न्याय प्रणाली मौलिक रूप से ब्रिटिश व्यवस्था पर आधारित है अतः ब्रिटिश कानून हमारे लिए , बिना मौलिक परिवर्तन किये , अधिक उपयुक्त हो सकते हैं |
 बहुत से प्रावधान अभी भी हमारे संविधान तक ही सीमित  हैं व कोई संसदीय कानून उनकी व्याख्या नहीं करते हैं जिससे न्यायपालिका को  मनमानी व्याख्या करने का खुला अवसर उपलब्ध होता है | विडम्बना  ही है कि पूरे देश में सामान मौलिक कानून- साक्ष्य अधिनयम ,1872, व्यवहार प्रक्रिया संहिता ,1908, दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973, तथा भारतीय दण्ड संहिता,1860- के बावजूद केरल  राज्य के निचले न्यायालयों के  न्यायाधीश प्रति वर्ष औसत 2575 मुकदमे निपटाते हैं जबकि बिहार  राज्य के निचले न्यायालयों के  न्यायाधीश प्रति वर्ष औसत मात्र 284 मुकदमे निपटाते हैं |इसी प्रकार तमिलनाडू राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रति वर्ष औसत 5005 मुकदमे  निपटाते हैं जबकि दिल्ली राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रति वर्ष  मात्र 1258 औसत मुकदमे निपटाते हैं | देश में न्यायिक जगत में नियंत्रण एवं अनुशासन का अभाव स्पष्ट है |इंग्लैंड में ऊपरी न्यायलयों की  कार्यप्रणाली पर नियंत्रण के लिए  सुप्रीम कोर्ट अधिनियम ,1981 अधिनियमित है | दक्षिण आस्ट्रेलिया ने भी पारदर्शिता के लिए न्यायालय प्रशासन अधिनयम , 1993 पारित कर न्यायालय स्टाफ का दायित्व तय कर रखा है |
 ब्रिटिश कानून इस दृष्टिकोण से बनाये  जाते थे कि विदेशियों द्वारा देशी लोगों पर शासन करना तथा साम्राज्य का खजाना भरना आसान हो सके | हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था ने भी इसी परंपरा का निर्वाह कर सत्तासीन लोगों के लिए स्वछन्दता को आसान बनाया है | हमारे मौलिक कानून- साक्ष्य अधिनयम ,1872, व्यवहार प्रक्रिया संहिता ,1908, दण्ड प्रक्रिया संहिता,१९७३, तथा भारतीय दण्ड संहिता,1860 ब्रिटिश साम्राज्य की ही देन है | यद्यपि दण्ड प्रक्रिया संहिता का नवीनीकरण किया  गया है किन्तु इसमें मौलिक परिवर्तन नहीं किया गया है , यह मूलतः दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 पर ही आधारित है | भारतीय गणराज्य की शासन व्यवस्था व कानून एवं न्याय प्रणाली में अभी भी साम्राज्यवाद की छवि दिखाई देती है |हमारी संसद समयानुकूल कानूनों का निर्माण  करनें में विफल है अतएव हमें पुराने साम्राज्यवादी कानूनों से ही काम चलाना पड़ता है |हमें समस्त पुराने कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए कि क्या ये संविधान के अनुरूप हैं |

यद्यपि इसी अवधि में इंग्लैंड ने (सम्राट के अधीन होते हुए भी) कानून में  संशोधन कर लोकतान्त्रिक मूल्यों का संरक्षण किया है  और हमने पूर्णतः स्वतंत्र एवं संप्रभु होकर भी न तो नए कानूनों का निर्माण किया और न ही इंग्लैंड के नए कानूनों का अनुसरण करना सीखा है जबकि इंग्लैंड आज हमसे काफी आगे निकल गया है |व्यक्तिगत स्वतंत्रता जीवन का अमूल्य अधिकार है तथा संविधान के अनुच्छेद 20 से 22 तक में इसका प्रावधान है किन्तु इन अमूल्य मूलाधिकारों की  व्याख्या कर संसद ने आज तक कोई व्यापक कानून का निर्माण नहीं किया परिणामस्वरूप न्यायाधीश , वकील एवं पुलिस अपनी सुविधानुसार इनकी व्याख्या करते रहते हैं| आज अपराधिक न्याय तंत्र में गिरफ़्तारी एवं जमानत भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत हैं |हमारे राष्ट्रीय पुलिस आयोग की तीसरी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि 60% से अधिक गिरफ्तारियां अनावश्यक होती हैं तथा यह पुलिस में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत हैं तथा इन गिरफ्तारियों पर जेलों के कुल बजट का 43.2 % भाग व्यय होता है | खेद का विषय है कि 11.07.78 को प्रस्तुत इस रिपोर्ट पर हमारी माननीय संसद द्वारा आज तक गंभीर चिंतन कर कोई कानून नहीं बनाया  गया है जबकि इंग्लैंड में जमानत के विषय में 75 धाराओं वाला अलग से - एक व्यापक संहिताबद्ध कानून- जमानत अधिनयम ,2000 बनाकर न्यायालयों एवं पुलिस के विवेकाधिकार को सीमित कर दिया गया है |यद्यपि भारतीय उच्चतम न्यायालय ने जोगिन्द्रकुमार के मामले(1994)  में कहा है  कि जघन्य अपराध को छोड़कर पुलिस को गिरफ़्तारी को टालना चाहिए  तथा मजिस्ट्रेट को इन निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करनी चाहिए  किन्तु व्यवहार में पुलिस अनावश्यक गिरफ्तारियां करती है व  मजिस्ट्रेट फिर भी जमानत से इंकार कर अभिरक्षा में भेजते रहते हैं | यदि स्वयं गिरफ़्तारी ही अनावश्यक एवं अन्यायपूर्ण हो तो अभिरक्षा किस प्रकार न्यायोचित हो सकती है |

इंग्लैंड में अपराधों का वर्गीकरण भी दोषारोपण योग्य ,सारांशिक कार्यवाही योग्य , गिरफ़्तारी योग्य , गंभीर गिरफ़्तारी योग्य आदि हैं  तथा पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम 1984 की  धारा 24 के अंतर्गत पुलिस  द्वारा गिरफ़्तारी का अधिकार बड़ा सीमित है जबकि जमानत सम्बंधित कानून बड़ा उदार है | पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम 1984  , की  धारा 1 के अंतर्गत पुलिस के तलाशी के अधिकार भी सीमित हैं | जमानत अधिनियम 2000 की  धारा 21 के अंतर्गत बिना वारंट के गिरफ्तार करने पर अभियुक्त को पुलिस स्वयं जमानत पर छोड़ सकती है | इसी प्रकार आपराधिक  न्याय अधिनियम 2003 की  धारा 3 के अंतर्गत पुलिस थाने से बाहर भी पुलिस जमानत पर छोड़ सकती है | जमानत अधिनियम 2000 की  धारा 18  के अंतर्गत जमानत की  सुनवाई व्यक्तिगत भी हो सकती है |इंग्लैंड में अन्वीक्षा कानून बड़ा लचीला है | मात्र कुछ आपवादिक गंभीर अपराधों को छोड़कर अधिकांश अपराध या तो सारांशिक रूप में या वैकल्पिक रूप (दोषारोपण योग्य) में दोनों तरह से अन्वीक्षा योग्य हैं |

रिमांड व अभिरक्षा के विषय में भी इंग्लैंड का कानून जनता के लिए बड़ा उदार है | पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम की  धारा 44  के अंतर्गत  एक अभियुक्त को मजिस्ट्रेट द्वारा एक बार में अधिकतम 36 घंटे के लिए तथा कुल मिलकर 96 घंटे के लिए पुलिस को सौंपा जा सकता है एवं आपराधिक कानून अधिनयम 1977, की  धारा 42 के अंतर्गत अभिरक्षा की अधिकतम अवधि 28 दिन है | पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम की  धारा 44  के अंतर्गत  पुलिस द्वारा अभिरक्षा की मांग करने पर उसे शपथपत्र देना पडता है | ठीक इसके विपरीत एक अभियुक्त को हमारे  यहाँ मजिस्ट्रेट द्वारा एक बार में अधिकतम 15 दिन के लिए तथा कुल मिलकर 90 दिन  के लिए अभिरक्षा में  दिया जा सकता है | जब देश (1898 )में आवागमन के समुचित साधन नहीं थे तो मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए 24 घंटे की अवधि उचित हो सकती थी किन्तु अब  हमारे कानून में व्यवस्था की जानी चाहिए कि  गिरफ़्तारी के बाद 12 घंटे के भीतर या थाने पहुँचने के 6  घंटे के भीतर , जो भी पहले हो ,  अभियुक्त को निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जायेगा चूँकि  मजिस्ट्रेट 24 घंटे ड्यूटी पर उपलब्ध रहता है |
हमारे संविधान के अनुच्छेद 20 (3) में अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य न देने का संवैधानिक अधिकार है किन्तु पुलिस यातनाएं एवं इस अधिकार का उल्लंघन आज देश में सर्वविदित हैं | हमारी संसद ने इस दिशा में किसी  कानून का निर्माण नहीं किया है | यद्यपि कुछ न्यायिक दृष्टांतों में इस अधिकार को माना गया है किन्तु न्यायिक दृष्टांत किसी अधिनियमित कानून का स्थान नहीं ले सकते तथा उन पर मत भेद रहता है | इंग्लैंड में अभियुक्त के चुप रहने के अधिकार व इसके परिणाम को भी आपराधिक  न्याय एवं लोक व्यवस्था अधिनियम 1994 की  धारा 34 तथा 35  के अंतर्गत परिभाषित कर रखा है |
आज पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु ,यातनाएं व अमानवीय व्यवहार एवं फर्जी मुठभेड़ में मृत्यु हमारे  यहाँ बड़ी सामान्य बातें बन गयीं हैं जिनके विषय में अलग से संहिताबद्ध कानून की  आवश्यकता है |ऐसे कानून में मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम के समान क्षतिपूर्ति के भी व्यापक समुचित प्रावधान होने चाहिए | इंग्लैंड में पुलिस एवं आपराधिक साक्ष्य अधिनियम 1984  की  धारा 83  के अंतर्गत पुलिस के विरूद्ध शिकायत का विधिवत तंत्र स्थापित है |

ब्रिटिश भारत में अंग्रेज न्यायाधीश हुआ करते थे अतएव उनके लिए गर्मी तथा सर्दी की छुटियाँ हुआ करती थीं किन्तु आज जब कार्यपालक न्यायालय बिना गर्मी की छुटियों के कार्यरत रहते हैं तो भारतीय न्यायधीशोंयुक्त न्यायिक न्यायालयों द्वारा गर्मी , सर्दी , दीपावली , दशहरा आदि की  लंबी छुटियों का कोई औचित्य नहीं है विशेषकर तब जबकि बकाया मामलों का न्यायलयों में अम्बार लगा हुआ है |वर्तमान में उच्च न्यायालय सामान्यतयावर्ष में 120 दिन के लिए लगते हैं | केंद्र सरकार ने बैंकों में छुटियों की संख्या वर्ष में 15 तक सीमित कर दी है | संविधान की  अनुसूची 7 की सूची 1 की प्रविष्टि 78 के अनुसार उच्च न्यायलयों में छुटियों का निर्धारण केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार में है अतएव उच्च न्यायालयों के वर्ष में न्यूनतम 190  कार्य दिवस सुनिश्चित करने हेतु सरकार को जनहित में अपना अधिकार प्रयोग करना चाहिए |

हमारी लोकतान्त्रिक व समाजवादी सरकार को चाहिए  कि उक्त विदेशी  कानूनों का भारतीय सन्दर्भ में लाभप्रद अध्ययन कर समुचित कानून बनाये |  

Sunday, 29 May 2011

उचित प्रक्रिया


राजस्थान उच्च न्यायालय ने निजाम बनाम जयपुर विकास प्राधिकरण (एआईआर 1994 राजस्थान 87) में कहा है कि प्रतिनिधि वाद जैसी विस्तृत अर्थों वाली कानूनी कार्यवाही आम आदमी के न्याय के लिए है और उन लोगों के लिए आवष्यक रूप से प्रति प्रेरणा है जो कि प्रक्रियागत कमियों के आधार पर वास्तविक मुद्दे को विफल करना चाहते हैं। हमारी सामाजिक आर्थिक परिस्थितियांे में मान्य स्थिति के उदारवादी अर्थ से लोकहित पनपता है और उच्च स्तरीय न्यायालयों में वास्तविक और उदारवादी विचारधारा से उपचार का लाभ कई लोगों को मिलता है विषेशतया तब जब कि वे कमजोर हो। उचित प्रक्रिया के सुसंगत कम मुकदमेबाजी यही निर्णायक कानून का लक्ष्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेष प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड बनाम प्रोफेसर ए.सी. नायडू के निर्णय दिनांक 22.12.02 में कहा है कि आज के उभरते हुए न्यायषास्त्र में पर्यावरण सम्बन्धी अधिकार सामूहिक अधिकार है जिन्हें तीसरी पीढ़ी के अधिकार कहा जाता है। पहली पीढी के अधिकार राजनैतिक अधिकार हैं जबकि दूसरी पीढी के अधिकार सामाजिक और आर्थिक है। पेयजल तक पहुंच जीवन की मूलभूत आवष्यकता हो और अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत राज्य का कर्त्तव्य है कि अपने नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराये।
सुप्रीम कोर्ट ने मुनिसिपल कांउसिल, रतलाम बनाम वृद्धिचन्द (1980 एआईआर सु.को.1622) में कहा है कि यद्यपि दोनो संहितायें काफी पुरानी है किन्तु उन्हें संविधान से नये सामाजिक न्याय की दिषा देकर गतिमान उपचार का साधन बनाया जा सकता है। लोगों को सामाजिक न्याय देय है इसलिए वे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 में मजिस्ट्रेट जैेसे लोक अधिकारी में समाहित क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार की षक्तियों के प्रयोग में न्यायपालिका को न्याय तक पहुंच की व्यापकता के सिद्धान्त को समझना चाहिए जो कि संविधान के अनुच्छेद 38 तथा विकासषील देषों की जरूरतों से है।
उड़ीसा उच्च न्यायालय ने जयकृश्ण पाणीग्राही बनाम ऋशिकेष पण्डा (1992क्रि. ला.ज.1056) में कहा है कि पड़ौसी की छत से पेड़ का झूकना या पत्रों आदि का झड़ना यदि पड़ौसी के घर में जीवन को संकट उत्पन्न करता है तो पड़ौसी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के दायरे में मजिस्ट्रेट के सामने कार्यवाही कर सकता है और मजिस्ट्रेट ऐसी कार्यवाही करने में अपने क्षेत्राधिकार के भीतर है और उपयुक्त आदेष पारित कर सकता है यदि वह संतुश्ट है कि धारा 133 की आवष्यकताएं परिस्थितियां तथा तथ्य इस प्रकार पूर्ण होते हैं कि न्यूसेन्स हटाने के लिए सषर्त आदेष पारित किया जा सकता है।

Saturday, 28 May 2011

हमारा सुप्रीम कोर्ट और उसकी मनमानी व्याख्याएं


सुप्रीम कोर्ट ने मुनिसिपल कमेटी पटियाला बनाम मॉडल टाऊन निवासीगण के निर्णय दिनांक 01.08.07 में स्पश्ट किया है कि यह सुनिष्चित है तथा बार-बार कथन की आवष्यकता नहीं है कि अपने क्षेत्र में संविधान में प्रावधान की गई मर्यादा के अधीन विधायिका ही सर्वोपरि है। विधायिका को ही यह तय करना है कि किस विशय में कब और कैसे कानून बनाये जाने हैं। जब जन भावना से ओतप्रोत कोई व्यथित व्यक्ति या सामाजिक कार्यकर्ता समूह न्यायलय पहंुचता है या न्यायालय यह पाता है कि किसी कार्यपालक ने अपने संविधान सम्मत कर्त्तव्यों के निर्वहन में विफल रहा है जिससे गरीब और वंचित व्यक्ति को षोशण और अन्याय वहन करना पड़ रहा है या कोई सामाजिक कानून जो उनके लाभ के लिए अधिनियमित किया गया है, लागू नहीं किया जाता है न्यायालय को अवष्य ही हस्तक्षेप करना चाहिए और कार्यपालक को अपने कानूनी तथा संवैधानिक दायित्वों को पूर्ण करने के लिए विवष करना चाहिए और सुनिष्चित करना चाहिए कि समाज के वंचित और क्षतिग्रस्त व्यक्ति षोशण और अन्याय के षिकार न हो व वे अपना सामाजिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने चिरंजीत लाल चौधरी बनाम भारत संघ (एआईआर 1951 सु.को. 41) में कहा है कि अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत सुप्रीम कोर्ट को रिट बनाने के मामले में व्यापक विवेकाधिकार है जिसके माध्यम से मामले विषेश की परिस्थितियों की आवष्यकतानुसार और इस अनुच्छेद के अन्तर्गत कोई आवेदन पत्र मात्र इस आधार पर फैंकी नहीं जा सकती कि उसमें उचित रिट के लिए समुचित आधार अथवा उचित राहत के लिए निर्देष हेतु प्रार्थना नहीं की गयी है।
सुप्रीम कोर्ट ने ई.पी.रियोअप्पा बनाम तमिलनाडू राज्य के निर्णय (1974 एआईआर 555) में कहा है कि जब कोई कार्य स्वैच्छाचारी है यह स्पश्ट है कि यह राजनीतिक तर्क और संवैधानिक कानून दोनों के अनुसार असमान है और इसलिए यह अनुच्छेद 14 के उल्लंघन में है और यदि यह किसी सार्वजनिक रोजगार को प्रभावित करता है तो यह अनुच्छेद 16 का भी उल्लंघन करता है। उनकी अपेक्षा है कि राज्य कार्य सुसंगत नियमों के अनुरूप हो जो कि समान रूप से है। यह किसी बाहरी या असंगत विचारण से निर्देषित नहीं होने चाहिए क्योंकि ऐसा करना समानता से मनाही होगा। दुर्भावनापूर्ण षक्ति का प्रयोग और मनमानापन एक ही दूराचार से निकलने वाले अलग-अलग घातक हथियार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अषोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 10.04.08 में कहा है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह मानववाद तथा वैज्ञानिक दृश्टिकोण का विकास करे। उसका मूलभूत कर्त्तव्य है कि वह सभी क्षेत्रों में व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कृश्टता की ओर आगे बढ़े ताकि देष हमेषा उच्च उपलब्धियों की ओर आगे बढ़ता रहे। राज्य सभी नागरिकों का समूह है इसलिए अनुच्छेद 51 ए के अन्तर्गत राज्य पर स्पश्टतया कोई मूल कर्त्तव्य नहीं डाला गया है। अपितु तथ्य यह है कि हर नागरिक का सामूहिक कर्त्तव्य राज्य का कर्त्तव्य है जो कि मुद्दे के हल करने के लिए केवल निर्देष के रूप में ही वहीं काम करता बल्कि न्यायालयों द्वारा दी जाने वाली राहत को बनाने में भी कार्य करता है। मूल कर्त्तव्यों का संवैधानिक विधायन यदि इसका कोई अर्थ हो तो न्यायालयों द्वारा इसे सहारे के रूप में प्रयोग करना चाहिये यहां तक कि राज्य के संवैधानिक मूल्यों से भटकते हुए कार्य को मना करने के लिए भी प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार किसी भी व्यक्ति, वर्ग या क्षेत्र का हित राश्ट्र हित से बड़ा नहीं है।
रितेष तिवाड़ी बनाम उत्तर प्रदेष राज्य में निर्णय दिनांक 21.09.10 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिविल प्रक्रिया के अन्तर्गत सुनवाई और रिट या जवाबी हलफनामों में फर्क है। एक दावे या लिखित कथन में तथ्यों का उल्लेख होता है या साक्ष्यों का नहीं। एक रिट या जवाबी हलफनामें में केवल तथ्य ही नहीं अपितु प्रमाण में तथ्यों को भी कथन तथा संलग्न करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने श्रीमती षैलवी बनाम कर्नाटक के निर्णय दिनांक 05.05.10 में कहा है कि हम धारित करते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति के साथ प्रष्न के उत्तर के लिए चाहे आपराधिक मामले में अनुसंधान हो या अन्यथा कोई जबरदस्ती नहीं की जायेगी। ऐसा करने का अभिप्राय व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में अनुचित हस्तक्षेप होगा फिर भी हम इस बात को अनुमत करते हैं कि इन तकनीकों के आपराधिक न्याय में प्रयोग के लिए स्वैच्छिक प्रषासन के लिए स्वतन्त्रता देते हैं कि बषर्ते कुछ सुरक्षा उपाय अपनाये जाये। यहां तक कि सहमति देने वाला व्यक्ति इन तकनीकों से गुजरता है तो भी उन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इन जांचों से गुजरते समय वह होष हवास में नहीं रहता फिर भी यदि इस सूचना के आधार पर बाद में साक्ष्य खोजा जाता है तो साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 27 के अन्तर्गत प्रयोग किया जा सकता है।

Friday, 27 May 2011

न्यायालयों की पक्षपातपूरण व्याख्याएं


सुप्रीम कोर्ट ने आल इण्डिया जजेज एषोसियषन बनाम भारत संघ (एआईआर 1993 सु.को. 2493) में स्पश्ट कहा है कि इसके विपरीत कई राज्यों में न्याय प्रषासन की दक्षता भूख मर रही है। किन्तु यह राज्यों के लिए राजस्व कमा रही है। जब कर्त्तव्य बाध्यकारी हो तो इस बात की षिकायत नहीं सुनी जा सकती कि उससे वितीय भार पड़ता है। यदि न्यायिक धारा प्रारम्भ से ही दूशित हो जाती है तो न्यायपालिका की स्वतन्त्रता हमेषा के लिए खतरे में पड़ जायेगी। हम इस वास्तविकता से आंखे नहीं मूंद सकते कि वकीलों के अच्छी कमाई, कई बार तो किये गये श्रम और कौषल के अनुपात में अधिक,  होने से सक्षम वकील न्यायिक पद स्वीकार करने के अनिच्छुक रहते हैं। न्यायाधीष के समक्ष आने वाले प्रत्येक मामले की अपनी विषेशतायें होती है। जिन पर ताजा दिमाग और कौषल लगाने की आवष्यकता है। न्यायाधीष को लगातार विचार करने और प्रतिभा दिखाने की आवष्यकता रहती है। सभी सम्बन्धित को यह याद दिलाना उचित है कि न्यायाधीष को समाज की अपेक्षानुसारअलग प्रवृति के कर्त्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है ।
यदि वह सावधान नहीं है तो न्यायधीष प्रबल सिविल युद्ध छेड़ देगा या वह क्रान्ति को तेज कर देगा ..वह अचानक षान्तिपूर्ण किन्तु - देष के राजनैतिक रंग में मौलिक परिवर्तन कर देगा। एक न्यायाधीष में वांछित गुण स्पश्टतया कहे जा सकते हैं कि वह भूला हो और उसके बारे मे ऐसे ही विचार हो। इस प्रकार की विष्वसनीयता आसानी से अर्जित नहीं की जा सकती। न्यायाधीष में अन्याय को समाप्त करने की षक्ति होनी चाहिए और वे गुण जो इतिहासकारों, दर्षनषास्त्रियों और पैगम्बरों में हो, की आवष्यकता है। कानून एक लक्ष्य का साधन है और वह लक्ष्य न्याय है। लेकिन वास्तव में कानून और न्याय दूर के पड़ौसी हैं, कई बार अजनबी पक्षद्रोही भी। यदि कानून न्याय को समाप्त कर देता है तो लोग कानून समाप्त कर देते हैं और कानूनविहीनता विकास को अवरूद्ध कर देती है, व्यवस्था को बाधित करती तथा प्रगति को पीछे धकेल देती है। किन्तु मात्र यह तथ्य कि अनुच्छेद 309 कार्यपालकों तथा विधायिका को न्यायपालिका के लिए सेवा षर्तें तय करने का अधिकार देती है का अभिप्रायः यह नहीं है कि न्यायपालिका का इससे कोई लेना देना नहीं है। प्रष्नगत निर्देष देने में इस न्यायालय ने कार्यपालकों तथा विधायिका को अपना कर्त्तव्य पूर्ण करने के लिए कहा है जब जब भी कार्यपालकों द्वारा बाध्यकारी कर्त्तव्यपालन में विफलता रही है। न्यायालय निर्देष जारी करता है। इस प्रकार के आदेष देने की षक्ति न्यायालयों के पास है।
सुप्रीम कोर्ट ने विनयचन्द्र मिश्रा के अवमान प्रकरण (1993 एआईआर 2348) में कहा है कि इस न्यायालय के पास भारत के समस्त न्यायालयों पर पर्यवेक्षणीय क्षेत्राधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध ए.आर. अन्तुले बनाम आर.एस.नायक (1988 एआईआर 1531) प्रकरण में कहा है कि उच्च न्यायालय उच्च स्तरीय रिकॉर्ड न्यायालय है और उसे यह तय करना है कि क्या कोई मामला उसके क्षेत्राधिकार में है अथवा नहीं। उक्त आदेष न्यायिक आदेष है और यदि यह गलत है तो कोई व्यक्ति चाहे अजनबी हो तो भी यदि इससे व्यथित है इस न्यायालय में अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत पहंुच सकता है और आदेष को अपील में ठीक किया जा सकता है लेकिन ऐसे आदेष की वैधता या औचित्य का प्रष्न अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत रिट द्वारा नहीं उठाया जा सकता।
लेखकीय टिप्पणी - यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने 1998 ।प्त् ैब् 128  में कहा है कि नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मुनीर सैयद इबना हुसैन बनाम महाराश्ट्र राज्य (1976 एआईआर 1992) में कहा है कि यह विष्वास करना कठिन है कि इस न्यायालय के निर्णयों का बम्बई उच्च न्यायालय को ज्ञान नहीं था या अपीलार्थी ने उनका उल्लेख नहीं किया था। किसी भी स्थिति में इस न्यायालय द्वारा घोशित कानून बम्बई उच्च न्यायालय का अनुच्छेद 141 के अनुसरण में कर्त्तव्य है कि वह अपना दृश्टिकोण स्पश्ट करते कोई भी उचित कारण देते हुए हुए लागू करे।

Thursday, 26 May 2011

औपचारिक नहीं वास्तविक न्याय


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मोती सुनार उर्फ मोतीलाल बनाम उ0प्र0 राज्य (1997 क्रि.ला.ज. 2260 इलाहा.) में कहा है कि यहां तक कि एक अपराधी या आदतन अपराधी के जीवन में ऐसा अवसर आता है कि वह षांतिपूर्ण जीवनयापन प्रारम्भ कर देता है। जब पुलिस के अनुसार उसने बाद में अपनी गतिविधियां सुनारी के पेषे तक सीमित कर दी हो और रिपोर्ट के अनुसार उसने इस पेषे के अतिरिक्त किसी अन्य गतिविधि में रूचि नहीं ली। इसलिए याची के मामले में पुलिस निगरानी ने याची की निजता का गंभीर अतिक्रमण हुआ है और उसीे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता यथा संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत हैं के मूल अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (घ) के अन्तर्गत विचरण की स्वतन्त्रता का गंभीर अतिक्रमण हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने सचिव हरियाणा राज्य बिजली बोर्ड बनाम सुरेष के निर्णय दिनांक 04.04.99 में कहा है कि न्यायालय समाज के लिए है और विधायन के किसी लाभप्रद हिस्से के अर्थान्वयन के प्रष्न पर उसकी पांडित्यपूर्ण संकीर्ण व्याख्या न्यायोचित नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने महाराश्ट्र राज्य बनाम प्रभु (1994 एससीसी (2)481) में कहा है कि उच्च न्यायालय सरकार के कार्य करने पर नियंत्रण रखता है और कर्त्तव्यों के उचित, न्यायपूर्ण एवं सही निश्पादन द्वारा नियम और कानून की अनुपालना सुनिष्चित करता है। यदि सरकारी या कोई प्राधिकारी नियम या कानून के विरूद्ध कोई आदेष पारित करता है तो उसे न्यायालय रिट क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत संषोधन कर सकता है। यह (दागदार का षिक्षा बोर्ड का सदस्य रहना) व्यवस्था में समाज का विष्वास व आस्था को हिला देता है और यहां तक कि ईमानदार एवं निश्ठावान को भी अपने रास्ते से भटकने के लिए लालायित कर देता है। उच्च न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वह संविधान का संरक्षक होने के नाते सामाजिक संतुलन बनाये रखने के लिए जहां आवष्यक हो न्याय के लिए हस्तक्षेप करे और जहां ऐसा करना सामाजिक हित व लोक भलाई के नहीं हो हस्तक्षेप करने से मना करे।
सुप्रीम कोर्ट ने रमनकुटी गुप्तान बनाम आवारा (एआईआर 1994 सु.को. 1699) में कहा है कि प्रक्रिया न्याय के लिए एक नौकरानी है और यदि प्रक्रिया क्षेत्राधिकार सम्बन्धित बिन्दु को नहीं छूती है तो इसे सारभूत न्याय के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। अतः तकनीकी बारिकियां सारभूत न्याय के रास्ते में आडे़ नहीं आनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने रफीक बनाम मुंषीलाल ( 1981 एआईआर 1400) में कहा है कि अपील की सुनवाई में पक्षकार की उपस्थिति न केवल अनावष्यक है अपितु मुष्किल से ही कोई उपयोगी है। चूंकि एक पक्षकार के वकील ने चूक की इस कारण अन्याय भुगतने वालों निर्दोश पक्षकार के अन्याय में हम भागीदार नहीं बन सके।
सुप्रीम कोर्ट ने राम एण्ड ष्याम कम्पनी बनाम हरियाणा राज्य (एआईआर 1985 सु.को. 1147) में कहा है कि प्रायः यह स्पश्ट कहा जाता है कि नियम जो यह अपेक्षा करता है कि वैकल्पिक उपचार निषेश करे यह सुविधा और विवेकाधिकार का नियम है न कि विधि का नियम। किसी भी प्रकार से यह न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं करता । यह विषेश रूप से स्पश्ट कर दिया जाना चाहिए कि जहां षिकायत किया गया आदेष अवैध या विधि विरूद्ध है, प्रतिकूल रूप से प्रभावित व्यक्ति द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत रिट लगेगी और ऐसी याचिका इस आधार पर निरस्त नहीं की जा सकती कि इसकी अपील राज्य सरकार या उच्चाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत होगी। एक अपील सभी मामलों में वैकल्पिक उपचार क्षेत्राधिकार एवं गुणावगुण के मध्य बारीक अन्तर को छोड़ते हुए राहत प्रदान नहीं कर सकती है। लेकिन यदि समाजवादी या यह षब्द समाज या सार्वजनिक सम्पति केे सार्वजनिक उद्देष्य से किसी के साथ कठोर संव्यवहार करता है। एक अन्य जगह कहा गया है कि सरकार को सार्वजनिक हित में कार्य करना चाहिए यह स्वेच्छाचारी या बिना कारण के कार्य नहीं कर सकती और यदि ऐसा करती है तो उसे अवैध घोशित किया जा सकता है।

Wednesday, 25 May 2011

हमारे अधिकार


सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल राज्य बनाम उम्मेद राम षर्मा (1986 एआईआर 847) में कहा है कि सड़क तक पहंुच अपने आप में जीवन तक पहुंच है। यह प्रस्ताव सुस्थापित है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाज फाउन्डेषन बनाम दिल्ली सरकार के निर्णय दिनांक 02.07.09 में कहा है कि यह हमारे संविधान के मूलभूत सिद्धान्तों में है कि राज्य का प्रत्येक अंग और अधिकारी अपने अधिकार या षक्ति संविधान से प्राप्त करता है और उसे इन षक्तियों की सीमाओं के भीतर कार्य करना पड़ता है। न्यायपालिका का गठन संविधान के अन्तिम व्याख्याकार के रूप में हुआ है और इसे ये निर्धारित करने का संवेदनषील कार्य दिया गया है कि सरकार की प्रत्येक षाखा को दिये गये अधिकार का क्षेत्र तथा उनका विस्तार क्या है ? संविधान के अन्तर्गत ऐसी षक्तियां प्रयोग करने की सीमाएं क्या है ? और क्या किसी षाखा का कोई कार्य इन सीमाओं का अतिक्रमण करता है? न्यायपालिका की भूमिका मूल अधिकारों की रक्षा करना है। आज का लोकतन्त्र जो कि बहुमत षासन के सिद्धान्त पर आधारित है। गर्भित रूप से इस सिद्धान्त को मान्यता देता है कि जो बहुमत के दृश्टिकोण से विमत या विमुख होते हैं उनके मूल अधिकारों की रक्षा करे। न्यायपालिका का यह सुनिष्चित करना कर्त्तव्य है कि वह इस बात में सन्तुलन स्थापित करे कि सरकार संख्या बल के आधार पर मूलभूत अधिकारों पर अभिभावी न हो जावे।
कलकता उच्च न्यायालय ने राज्य बनाम भारत संघ (एआईआर 1996 कल 181) में स्पश्ट किया है कि लोकहित वाद विधिक सहायता अभियान की विषेश भुजा है जो कि न्याय लाने का उद्देष्य रखती है। विधि के षासन का यह अभिप्राय नहीं है कि कानून का संरक्षण कुछ भाग्यषाली लोगों को ही मिले या निहित हितों को विधि का दुरूपयोग करने की अनुमति दी जाय।
सुप्रीम कोर्ट ने अनिल यादव बनाम बिहार राज्य (एआईआर 1982 सु.को.1008) के निर्णय में कहा है कि सत्य की अपने आप में प्रकट होने की अजीब प्रवृति है। अर्जुन गोस्वामी नामक कैदी को भागलपुर केन्द्रीय जेल में भेजा गया था उसने 20 नवम्बर 1979 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को आवेदन पत्र भेजा कि उसे दी गई यंत्रणा - विषेश रूप से उसे आखों से अंधा करने -की जांच की जाय । बाद में 11 अन्य कैदियों ने भागलपुर के सत्र न्यायाधीष को ऐसी ही षिकायतें भेजी तथा ध्यान देकर तुरन्त कार्यवाही का आग्रह किया। लेकिन आरोपों के विशय में पूर्ण एवं उचित जांच करने के स्थान पर विद्वान सत्र न्यायाधीष ने बड़ा ही संवेदनहीन एवं ठंडा जवाब भेजा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता में किसी भी षिकायतकर्ता को वकील उपलब्ध करवाने का प्रावधान नहीं है। अतः विधि अनुसार उपयुक्त कार्यवाही करने के लिए याचिकाएं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को अग्रेशित की जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ बनाम राहुल रस्गोत्रा (एआईआर 1995 सु.को. 223) के मामले में कहा है कि यह उपयुक्त समय है कि दोशी लोगों को जवाबदेह ठहराया जाये और उनकी ओर से कमियों से हुई जनधन की हानि के लिए दायी ठहराया जावे। सरकार सबसे बड़ी विवाद्यक होने के कारण अनावष्यक मुकदमे बाजी को घटाने तथा यह सुनिष्चित करने के लिए आवष्यक मुकदमेबाजी का संचालन उचित रूप से हो सरकारी मषीनरी मंे आमूलचूल सुधार की आवष्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एस.पी.गुप्ता बनाम भारत संघ (1981 सपली एस.सी.सी. 87) के प्रसिद्ध प्रकरण में कहा है कि जहां किसी व्यक्ति के साथ किसी कानून या संविधान के उल्लंघन द्वारा या अन्यथा कोई अवैध क्षति पहुंचायी जाती है और ऐसा व्यक्ति यदि गरीबी, असहायता या असमर्थता या सामाजिक या आर्थिक पिछड़ेपन के कारण न्यायालय में राहत के लिए पहुंचने में असमर्थ है तो समाज का कोई व्यक्ति उपयुक्त निर्देष, आदेष या रिट के लिए ऐसे व्यक्ति के लिए आवेदन पत्र से अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय और यदि ऐसे व्यक्ति के मूल अधिकार का हनन हुआ है तो कानूनी क्षति या अनुचित कृत्य के लिए न्यायिक उपचार हेतु अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत इस न्यायालय से मांग कर सकता है।

Tuesday, 24 May 2011

न्यायलय और उनकी सर्वोच्चता


सुप्रीम कोर्ट ने सब कमेटी ऑफ ज्यूडिसियल एकाउन्टेबिलीटी बनाम भारत संघ (एआईआर 1992 सु.को. 320) में कहा है कि यदि सदन की सम्पूर्ण कार्यवाहियों पर अध्यक्ष का नियंत्रण बना रहता है तो यह नहीं माना जा सकता कि न्यायालय के पास सामानान्तर क्षेत्राधिकार है जिसका परिणाम विरोधाभासी निर्देष जारी करना हो सकता है। इसके अतिरिक्त यह न्यायालय इस प्रकार की मदद के लिए कोई ऐसा दिषा निर्देष जारी नहीं कर सकता जिसका अंतिम परिणाम इसके क्षेत्राधिकार से बाहर हो। इस न्यायालय द्वारा पारित कोई आदेष या निर्देष मात्र व्यर्थ का अभ्यास में परिणित होेगा और ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी जिससे देष की सर्वोच्च विधायिका एवं न्यायिक प्राधिकारी दोनों ही हताष होगें। संविधान का ऐसा अभिप्राय कभी नहीं रहा होगा। इसलिए उपरी न्यायालय के न्यायाधीषों को हटाने की कार्यवाही के सम्बन्ध में न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट सहित को कोई आदेष पारित करने का क्षेत्राधिकार नहीं है।
लेखकीय टिप्पणी:ः-
यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने  1992;2द्ध ैब्ब् 428,द्ध  में कहा है कि यहां तक कि राश्ट्रपति एवं राज्यपाल द्वारा नियुक्ति के मामले में भी नियुक्त व्यक्तियों की योग्यता एवं पात्रता पर प्रष्न लगाया जा सकता है एवं उन्हें पद से हटाया जा सकता है किन्तु स्वयं अपनी बिरादरी न्यायाधीषों को हटाने के विशय में भिन्न रूख अपनाकर पक्षपात का स्पश्ट परिचय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने बी.बनर्जी बनाम अनिता पान (एआईआर 1975 सु.को. 1146) में कहा है कि कोई भी कानून मूल अधिकारों पर भूतकालिक प्रभाव से प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता। कानून एक समाज षास्त्र है और संवैधानिकता कड़े कानून सिद्धान्त पर आधारित नहीं है क्योंकि विधि का षासन जीवन के सिद्धान्त से निकला है। विलम्बित मुकदमेबाजी का षीघ्र निपटान निसंदेह रूप से न्यायालय के विवेकाधिकार के प्रयोग में है। कोई भी एक व्यक्ति अनुच्छेद के अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रता और अपने अधिकारों के अतिक्रमण की षिकायत कर सकता है।   
दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध बी.एम.डब्ल्यू. प्रकरण में वकीलों के अवमान प्रकरण की अपील आर.के.आनन्द बनाम रजिस्ट्रार, दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय दिनांक 29.07.09 में स्पश्ट किया है कि जो लोग टेलीविजन देखते हैं और अखबार पढ़ते है उनके लिए असफलता में समाप्त होने वाला यह दूसरा मामला है। इस मामले में पुलिस की कटु आलोचना हुई कि जिस मामले में कानून ने उसको पर्याप्त षक्ति एवं अधिकार दिया है मंे किस प्रकार निर्देष मांग रही है। बी.एम.डब्ल्यू मामला अटक-अटक कर अनन्त रूप से आगे बढ़ता है। जो कार्यक्रम एन.डी.टी.वी. पर लोगों को (न्यायालय सहित) दिखाया गया कि बी.एम.डब्ल्यू. की अन्वीक्षा में किस प्रकार शड़यन्त्र हुए ।जो कुछ दिखाया गया सारभूत रूप में सत्य और सही साबित होने वाला था। इस प्रकार कार्यक्रम बी.एम.डब्ल्यू. अन्वीक्षा के दौरान रूकावट या हस्तक्षेप के प्रयास को रोकने के स्पश्ट उद्देष्य से था। मीडिया को बाहर से नियंत्रण और विनयमित करने के किसी भी प्रयास से लाभ के स्थान पर हानि ही होती। वास्तव में बार काउन्सिलों ने न्याय प्रषासन के प्रसंग में कई सकारात्मक मुद्दे लिये हैं। इन्होेंने वकीलों के हित और कल्याण के लिए काफी कार्य किया है। किन्तु इन्होंने जो कार्य पेषेवर मानकों तथा वकीलों में अनुषासन लागू करने के लिए किया है उसका इससे कोई मेल नहीं है। यही विचार अन्य न्यायालयों का भी है। बिहार में अपने अनुभव के आधार पर इन पंक्तियों का लेखक कह सकता है कि अनुसंधान की रिपोर्ट या अन्वीक्षा का प्रभावषाली और षक्तिषाली अभियुक्तों द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। या तो गवाहांे को खरीद कर या उन्हें संताप देकर या अन्वीक्षण न्यायालय के लिए अभेद्य व्यवधान उत्पन्न कर और अन्वीक्षा को आगे नहीं बढ़ने देकर किन्तु दुर्भाग्य से मुष्किल से ही न्यायालयों की सामूहिक चेतना द्वारा ध्यान दिया गया है। जो अन्वीक्षा बाहरी कारणों से विफल होती है वह अपराध के षिकार के लिए दुखान्तिका है। विषेश रूप से प्रत्येक विफल अन्वीक्षा विधि के षासन पर आधारित समाज को विफल करती तथा चिढ़ाती है। प्रत्येक नाष हुई अन्वीक्षा आपराधिक न्याय प्रषासन पर धब्बा छोड़ देती है। बार-बार धब्बे लगने से निकाय पहचान योग्य नहीं रहता और तब यह लोगों को विष्वास और आस्था खो देता है। प्रत्येक असफल अन्वीक्षा कहने के लिए इस बात पर नकारात्मक टिप्पणी है कि राज्य उच्च न्यायालय निचले न्यायालयों पर अधीक्षक, पर्यवेक्षण और नियन्त्रण का दायित्व रखता है। उच्च न्यायालय द्वारा समय पर उठाया गया कदम एक मामले को भटकने से रोक सकता है। इस बात पर बल देना कि बकाया अन्वीक्षा या अन्वीक्षा के सम्बन्ध में स्टिंग ऑपरेषन न्यायालय की पूर्व अनुमति तथा सहमति से ही प्रकाषित की जा सकती है ऐसा करना न्यायालय की कार्यवाही रिपोर्ट को पूर्व सेंसर करना होगा और ऐसा करना स्पश्टतया संविधान के अनुच्छेद 19 (1) गारंटी दिये गये मीडिया के भाशण और अभिव्यक्ति के अधिकार का अतिक्रमण होगा। एनडीटीवी द्वारा प्रसारित स्टिंग कार्यक्रम व्यापक जनहित में था और इससे महत्वपूर्ण जन हेतु की पूर्ति हुई है। हम दुख के साथ वकील समुदाय के गिरते हुए पेषेवर स्तर पर हमारी चिन्ता व्यक्त करते हैं कि और हम यह महसूस करते हैं कि यदि इस प्रवृति को रोका और मोड़ा नहीं गया तो देष में न्याय प्रषासन के स्वास्थ्य पर बड़ा घातक प्रभाव होगा। लोकतान्त्रिक समाज में कोई भी न्यायिक निकाय संतोशजनक ढंग से काम नहीं कर सकता जिससे ऐसी बार का समर्थन प्राप्त हो जिसमें लोगों का अटूट विष्वास एवं आस्था हो। जो कि लोगों की आषाओ, प्रेरणाओं और आदर्षों में भागीदार हो और जिसके सदस्य लोगों की आर्थिक पहंुच के भीतर हो। अन्वीक्षा असफल हो जाती है क्योंकि इसकी बाहरी हस्तक्षेप से रक्षा नहीं की गई थी।

Monday, 23 May 2011

असमानता भागनी चाहिए


सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय षोशित कर्मचारी संघ (रेल्वे) बनाम भारत संघ (1981 एआईआर 298) में कहा है कि एक संवेदनषील हृदय और तेज दिमाग जिसमें लोगों के आंसुओं की आवाज हो देष की विकास सम्बन्धी आवष्यकताओं को तेजी से आगे बढ़ाएगा जिसमें कि ग्रामीण विस्तार और मलीन बस्तियां षामिल हो। निश्ठापूर्वक समर्पण और निश्ठायुक्त बुद्धिमता जो कि गुणों और उपयुक्तता के बड़े घटक हैं न कि ऑक्सफॉर्ड या कैम्ब्रिज, हार्वर्ड या स्टेनफॉर्ड जैसी संस्थाओं से डिग्रियां । असमानता चाहे हैसियत की हो चाहे सुविधा की चाहे अवसर की हो समाप्त होनी चाहिए। विषेशाधिकार समाप्त होना चाहिए और षोशण भागना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम कन्ज्यूमर एज्यूकेषन एण्ड रिसर्च सेण्टर (एआईआर 1995 सु.को. 1811) में कहा है कि नीति निर्देषक तत्वों के अध्याय में अनुच्छेद 38 राज्य पर लोगों के कल्याण को बढाने का दायित्व डालता है जिसमें कि राश्ट्रीय जीवन की प्रत्येक संस्था सामाजिक आर्थिक न्याय करने के लिए सामाजिक व्यवस्था को संरक्षित और सुरक्षित करेगी। यह हैसियत, सुविधाओं तथा अवसर देने में देष के विभिन्न भागों तथा व्यवसायों में संलग्न व्यक्तियों के बीच तथा व्यक्तियों के समूहों में असमानता को दूर करने का दायित्व डालता है । यदि जीविकोपार्जन के अधिकार संवैधानिक जीवन के अधिकार का भाग नहीं माना जाता तो व्यक्ति को उसके जीवन के अधिकार से वंचित करने के लिए इस प्रकार आजीविका के अधिकार से वंचित करना का कार्य पर्याप्त रहेगा। इस प्रकार जीवन के प्रभावी और अर्थपूर्ण तत्व के बिना वंचित करना जीवन को असंभव बनाना होगा किन्तु जैसा कि उपर कहा है कि क्या एक बीमाकर्ता ऐसी असंवैधानिक षर्त लगा सकता है चूंकि एक पॉलिसी विषेश के सम्बन्ध में प्रवेष करने का अधिकार कुछ लोगों तक ही सीमित कर दे। हम यहां यह स्पश्ट करना चाहते है कि एक बीमाकर्ता व्यवसायिक सिद्धान्तों के अनुसार सामान्य जनता के लिए पॉलिसी जारी करते समय षर्तें लगा सकता है किन्तु जैसा कि हम पाते हैं कि बीमा एक सामाजिक सुरक्षा का एक साधन है इसलिए यह संविधान की भावना और संविधान में उल्लेखित सामाजिक आर्थिक न्याय से सुसंगत होना चाहिए। इन न्यायालय ने धारित किया है कि न ही तो याची और न ही प्रत्यर्थी को अनुबन्ध में षामिल होने का अधिकार है किन्तु किसी भी सेवा या वस्तु के प्रस्ताव में उन्हें समान व्यवहार का अधिकार है। यह विषेशाधिकार इसलिए उत्पन्न होता है कि चूंकि सरकार लोगों के साथ व्यापार कर रही है और लोकतान्त्रिक प्रकृति की सरकार से अपेक्षा है कि वह अपने लेन देन में समानता और मनमानेपन का अभाव तथा भेदभाव का अभाव बरते। विषेशाधिकार कर्त्तव्य के विपरीत स्वतन्त्रता का रूप है। जब सरकारी गतिविधियों में सार्वजनिक तत्व विद्यमान हो तो औचित्य एवं समानता होनी चाहिए। यदि राज्य अनुबन्ध में षामिल होते तो ऐसा बिना भेदभाव और उचित प्रक्रिया से होना चाहिए।एक नागरिक को व्यवहार से अलग करना वैध अनुबंधिक सम्बन्धों से अलग करता है और अन्य लोगों की तुलना में भेदभाव करता है। यद्यपि राज्य को तर्कसंगत षर्तें लगाने का अधिकार है किन्तु स्वेच्छाकारी षर्तें लगाने से राज्य के साथ-साथ आनुशंगिक सम्बन्धों में षामिल होने से रोकता है। सरकार एक निजी व्यक्ति के समान भूमिका अदा नहीं नहीं कर सकती। सरकार की प्रत्येक गतिविधि में लोकतत्च विद्यमान है इसलिए इसे लोकहित के द्वारा निर्देषित होना चाहिए। कानून को समाज की तेजी से बदलती आवष्यकताओं को संतुश्ट करने के लिए विकास करना चाहिए और देष में हो रहे आर्थिक विकास से निकटता रखनी चाहिए। इसलिए जब नयी चुनौतियां सामने आये तो उनका सामना करने के लिए सामाजिक इंजीनियरिंग की तरह कानून का विकास होना चाहिए और सामाजिक आर्थिक चुनौतियां की समसामयिक की पूर्तियांे से निपटने के लिए विधि के षासन के तहत हर संभव प्रयास किये जाने चाहिये और या तो पुराने और अनुपयुक्त कानूनों को अमान्य करके या नये परिवर्तित सामाजिक आर्थिक दृष्य के अनुरूप कानूनों का समायोजन करके प्रत्येक प्रषासनिक निर्णय करणों पर आधारित होना चाहिए।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बलराज मिश्रा बनाम मुख्य न्यायाधिपति (2000 (1) ए. डब्ल्यू.सी. 296) में कहा है कि इस रिट याचिका में दूरगामी महत्व का प्रष्न उठा है कि क्या विभागीय पदौन्नति परीक्षाओं में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कर्मचारीगणों को अपने उत्तर हिन्दी में लिखने से रोका जा सकता है। यह बड़ा अजीब लगता है कि भारतीय संविधान के प्रारम्भ होने पर आधी षताब्दी बाद भी उच्च न्यायालय के कर्मचारी जो कि हिन्दी भाशी क्षेत्र में स्थित है उन्हें मात्र अंग्रेजी भाशा में उत्तर देने के लिए विवष किया जाये। उच्च न्यायालय ने हिन्दी भाशा में उत्तर देने की अनुमति प्रदान कर दी।
भारत संघ बनाम मुरासोली मारन (1977 ए.आई.आर. 225 सु.को.) में कहा है कि हिन्दी भाशा की प्रगति को इस प्रकार नहीं रोका जाना है। अंग्रेजी भाशा के प्रयोग में समय की वृद्धि का अभिप्राय यह नहीं है कि संघ की राजभाशा की प्रगति को छोड़ दिया जावे। अनुच्छेद 351 में अंतिम लक्ष्य दिया गया है कि जो कि भारत की मिश्रित संस्कृति को समृद्ध करने के लिए तथा हिन्दी भाशा के विकास और प्रसार के उद्देष्य को पूरा करता है।

Sunday, 22 May 2011

निर्दयी कानून


सुप्रीम कोर्ट ने कुमारी श्रीलेखा विद्यार्थी बनाम उत्तर प्रदेष राज्य (एआईआर 1991 सु.को. 537) में कहा है कि जो व्यक्ति मनमानेपन का आक्षेप करता है उसे ही यह साबित करना होता है। प्रथम अवसर पर उसे यह दर्षित करना होता है कि विच्छेपित राज कार्य तर्क संगत नहीं है जिस पर यह आधारित है या यह षक्ति प्रयोग के निर्धारित तरीके के विपरीत है। यानि यह दर्षित कर दिया जाता है तब इस आक्रमण को खारीज करने का भार राज्य पर आ जाता है कि वह स्थापित करे कि उसका कृत्य/निर्णय तर्कसंगत है। यदि प्रथम दृश्टया मनमानेपन का प्रकरण स्थापित हो जाता है। राज्य यह दर्षित करने में असमर्थ है कि उसका निर्णय तर्कसंगत है तो राज्य कृत्य स्वेच्छाचारी होने से नश्ट हो जाना चाहिए। विवेकाधिकार सहित षक्ति सौंपना जिसमें स्वैच्छाचार न हो तथा जिस उद्देष्य के लिए सौंपा गया उसके साथ जनहित हो और व्यक्तिगत या निजी लाभ नहीं, और न ही कोई व्यक्तिगत उन्माद। समस्त व्यक्ति जिन्हें ऐसे अधिकार सौंपे जाते हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि विधि के षासन के अन्तर्गत षक्ति प्रदानगी न्यायोचित ठहरायी जा सके।
मध्यप्रदेष उच्च न्यायालय ने अजीतसिंह बनाम राज्य (2002 क्रि.ला.ज. 2256) में कहा है कि भ्रश्टाचार ने समाज को जोंक की तरह जकड़ लिया है और  यथावांछित दण्ड लगाकर इसकी पकड़न ढीली की जा सकती है जिससे की रोकथाम वाला प्रभाव उत्पन्न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दी हितरक्षक समिति बनाम भारत संघ के मामले (1990 एआईआर 851) में कहा है कि यह सुनिष्चित है कि प्रषासनिक, विधायी और राज्य कृत्य या अकृत्य के लिए मूल अधिकार लागू करने के लिए न्यायिक पुनर्विलोकन अनुमत और इस राज्य के लोगों के अधिकारों का निर्णय न्यायपालिका और न्यायिक मंचों को करना है न कि कार्यपालकों या प्रषासकों को।
सुप्रीम कोर्ट ने प. बंगाल राज्य बनाम भारत संघ ( 1963 एआईआर  1241) में कहा है कि भारत की संप्रभुता यहां के लोगों में निहित है जिन्होंने कि उद्देषिका में लिखित उद्देष्यों के लिए भारत को संप्रभु लोक तन्त्रात्मक गणराज्य के रूप में अंगीकार किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने एम. नागराज बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 19.10.06 में कहा है कि समतावादी समानता की अवधारणा समता पर आधारित है और यह अपेक्षा करती है कि राज्य अपनी लोकतन्त्रात्मक षासन व्यवस्था के ढांचे के भीतर समाज के पिछड़े लोगो के पक्ष में सकारात्मक कार्य करें।
पटना उच्च न्यायालय ने डॉ. अवध किषोर प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य (1994 (2) बीएलजेआर 1203) में कहा है कि विष्वविद्यालय के विच्छेपित आदेष और सहमति के निरस्तीकरण से याचीगण के अधिकारों पर- सिविल एवं वितिय प्रभाव - डाला है। इस अकेले कारण से मेरा यह विचार है कि प्राकृतिक न्याय तथा स्वच्छ खेल के नियम यह मांग करते हैं कि ऐसी कार्यवाही करने से पूर्व याचीगण को अवसर दिया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गंगाकुमार श्रीवास्तव बनाम बिहार राज्य (एआईआर 2005 सु.को. 3123) में कहा हे कि 1. इस न्यायालय के अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत अधिकार पर्याप्त विस्तृत है लेकिन तथ्यों पर निश्कर्श में सहमति वाले आपवादिक मामलों में ही यह न्यायालय हस्तक्षेप करता है। 2.यदि उच्च न्यायालय अर्थान्वयन अन्यथा अनुचित रूप से भटक गया है तो यह न्यायालय उसके निश्कर्शों में हस्तक्षेप के लिए स्वतन्त्र है। इस न्यायालय के लिए अनुच्छेद 136 की षक्तियों का प्रयोग करना बहुत ही अपवादिक मामलों में खुला है जबकि आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण विधि का प्रष्न उठता है या निर्णय से न्यायालय की आत्मा को आधात लगता है। 3. जबकि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य विष्वनीयता एवं स्वीकार्यता की जांच में कम पड़ती है और इस पर कार्यवाही करना अत्यधिक असुरक्षित है और 5. साक्ष्य और निश्कर्श का मूल्यांकन प्रक्रिया सम्बन्धि कानून की भूल से दूशित है या प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों के विपरीत है। अभिलेख सम्बन्धी भूल और साक्ष्य का गलत पठन या जहां उच्च न्यायालय द्वारा निश्कर्शों में स्पश्ट भटकाव और अभिलेख पर साक्ष्य द्वारा असमर्थनीय हो।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमप्रकाष रेखी बनाम भारत संघ (एआईआर 1981 सु.को. 212) में कहा है कि जब एक व्यक्ति राज्य के एजेण्ट या उपकरण के रूप में कार्य करता है तो षक्ति सार्वजनिक है। इसलिए इस बात की तलाष करनी है क्या अधिनियम राज्य के एजेण्ट या उपकरण के रूप में षक्ति देता है जिससे स्वयं के या अन्यों के कानूनी सम्बन्धों पर प्रभाव पड़ता है। अब यह राज्य का कृत्य है कि वह विचार अभिव्यक्ति, विष्वास और पूजा की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय सुरक्षित करने के लिए कार्य करे और हैसियत तथा अवसर की समानता सुनिष्चित करे। हमें संविधान के मौलिक सिद्धान्तों के जीवन सार पर चर्चा करनी चाहिए कि क्या हम लोगों के मूल अधिकारों को कागजी आषाओं तक सीमित रखकर लोगों को भोंदू बना रहे है। इस आधारभूत विष्वास के संरक्षण के लिए न्यायिक षाखा ऐसा विष्वास भंग नहीं करेगी जिस व्याख्या से लोगों के अधिकारों से राज्य मुक्त हो जाये। इसी प्रकार गहन सरकारी नियंत्रण यह संकेत देता है कि निगम सरकारी एजेन्सी या उपकरण है। सामाजिक न्याय हमारे संविधान की अन्तरात्मा है। राज्य आर्थिक न्याय, जो कि आधारभूत विष्वास है, जिस पर हमारा संविधान टिका हुआ है का प्रोन्नतकर्ता है और वह देष भारतीय मानवता है। कानून और न्याय के बीच में आपसी तालमेल होना चाहिए और हमारी संवैधानिक योजना में निर्दयी कानूनी नहीं अपितु मानवीय वैधता है। हमारी षासन व्यवस्था की सच्ची षक्ति एवं स्थिरता समाज की सामाजिक न्याय में विष्वसनीयता है, न कि पूर्णतया कानूनीकरण।

Saturday, 21 May 2011

संवैधानिकता


सुप्रीम कोर्ट ने केरल राज्य बनाम उन्नी के निर्णय दिनांक 01.12.06 में कहा है कि प्रत्यायोजित विधायन की न्यायिक समीक्षा हेतु अतर्कसंगतता एक आधार है। किसी कानून की तर्कसंगतता या अन्यथा का निर्णय विभिन्न घटकों यथा व्यापार करने वाले व्यक्ति पर प्रभाव आदि द्वारा निष्चित किया जाना चाहिए। टोडी या षराब का व्यापार करने का किसी को कोई मूल अधिकार नहीं है लेकिन सभी लाईसेन्सधारियों के साथ समानता का बर्ताव होना चाहिए। यदि किसी अधीनस्थ कानून की वैधता या अन्यथा पर विचारण करना हो तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 आकर्शित होता है। जब किसी कानून में ऐसी षर्त है जिसे पूरा करना असंभव है तो कानून की अतर्कसंगतता मानी जावेगी। ऐसी स्थिति में राज्य का कर्त्तव्य है कि वह उसकी तर्कसंगतता प्रमाणित करे।
सुप्रीम कोर्ट ने आषाराम जैन बनाम टी. गुप्ता (एआईआर 1983 सु.को. 1151) में कहा है लोगों का व्यवस्थित एवं प्रभावी न्याय प्रषासन में वास्तविक एवं बाध्यकारी हित तथा महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यदि न्याय प्रषासन इस प्रकार संपन्न नहीं किया जाये तो समस्त अधिकार एवं स्वतन्त्रताएंे नश्ट होने का खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पी.रामचन्द्र राव बनाम कर्नाटक राज्य के निर्णय दिनांक 16.04.02 में स्पश्ट किया है कि सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह त्वरित न्याय प्रदान करे विषेश रूप से अपराधिक कानून के क्षेत्र में और संविधान की उद्देषिका, अनुच्छेद 21, 19 और 14 से उद्भूत होने वाले न्याय के अधिकार से मनाही के लिए संसाधनों या अर्थाभाव कोई बचाव नहीं है। अब समय आ गया है कि भारत संघ और विभिन्न राज्य सरकारों को अपना संवैधानिक दायित्व समझना चाहिए और न्याय प्रदानगी निकाय का मजबूत करने की दिषा में कुछ ठोस कार्य करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम आर.के. षैवाल के निर्णय दिनांक 13.03.08 में कहा है कि इस प्रकार की योजना से उदभूत आवासन का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ई) तथा 21 के अर्थ में मौलिक अधिकार है लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सरकार का कार्य अनुच्छेद 14 की मूल आवष्यकता को पूर्ण करना है अर्थात् समान रूप से स्थित लोगों को समानता से तथा समान संरक्षण देना है। अनुच्छेद 14 भारतीय संविधान का हृदय और आत्मा की तर्कसंगतता और औचित्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने महावीर ऑटो स्टोर बनाम इण्डियन ऑयल कॉरपोरेषन (एआईआर 1990 सु.को.1931) में कहा है कि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान स्थिति जैसी परिस्थितियों में नागरिकों से व्यवहार करने में सरकारी उपकरणों के लिए तर्क का नियम और मनमाने भेदभाव के विरूद्ध नियम, उचित खेल तथा प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त लागू होते है। यद्यपि नागरिकों के अधिकार अनुबन्ध की प्रकृति के हैं, अनुबन्ध में षामिल होने या न होने का निर्णय करने का तरीका और उद्देष्य सुसंगतता की जांच, और तर्कसंगतता, प्राकृतिक न्याय, समानता और अभेदकारी प्रकृति का लेन देन आदि न्यायिक पुनरीक्षा के अधीन है। यदि पारदर्षिता नहीं हुई तो औचित्य धूमिल हो जायेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने थॉमस दाना बनाम पंजाब राज्य (1959 एआईआर सु.को. 375) कि दण्ड षब्द का प्रयोग अनुच्छेद 20 (1) में इसी अर्थ में प्रयोग हुआ है। भारतीय दण्ड संहिता के प्रावधानों में अपराधियों के लिए निम्नांकित दण्ड बताये हैं।
1. मृत्युदण्ड, 2. आजीवन कारावास, 3. कारावास जिसके दो प्रकार है अर्थात् कठोर यानी सक्षम तथा साधारण, 5. सम्पति की जब्ती तथा 5. अर्थदण्ड।
सुप्रीम कोर्ट ने मलिक मजहर सुल्तान बनाम उत्तरप्रदेष लोक सेवा आयोग के निर्णय दिनांक 03.04.06 में कहा है कि लम्बे समय तक खाली पड़े पदों को न भरना लोगों को न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं से वंचित करता है। न्यायालयों में लम्बी बकाया सूची का एक कारण यह है ।सभी राज्य सरकारे, केन्द्र षासित प्रदेष और उच्च न्यायालयों को इस प्रकार निर्धारित समय-सारणी को फाइल करने के निर्देष दिये जाते है और ऐसी तिथि जिससे यह समय सारणी प्रभावी होगी। उक्त सभी को इस उद्देष्य के लिए समय सारणी लेने का निर्देष दिया जाता है कि ताकि प्रतिवर्श खाली पदों को समय पर भरा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने आर.के.जैन बनाम भारत संघ (एआईआर 1993 सु.को. 1769) में कहा है कि तीसरी श्रेणी के वे मामले है जहां मंत्री या अधिकृत सचिव के स्तर पर राश्ट्रपति के नाम से निर्णय लिया जाता है जो कि न्यायिक संवीक्षा से सुरक्षित नहीं है और न्यायालयों में परीक्षण तथा अन्वीक्षण कराये जाने हैं। यदि जनहित के दृश्टिकोण से अनुच्छेद 74 (2) या साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के अन्तर्गत सुरक्षा मांगी जाती है तो न्यायालय पहले कैमरे में विचार करेगा और उपरोक्तानुसार मुद्दे का निर्णय करेगा। यह सुरक्षा प्रषासनिक पक्ष से नहीं मांगी जानी चाहिए बल्कि वैध संसुगत और सषक्त कारणों या आधारों पर फाईल किये जाने वाले षपथ पत्र में कही जानी चाहिए।
संपत कुमार बनाम भारत संघ (एआईआर 1987 सु.को. 386) में इसी न्यायालय ने धारित किया है कि न्यायालय का प्राथमिक कर्त्तव्य संविधान और कानूनों की व्याख्या करना है और यह तय करने के लिए न्यायपालिका सर्वाधिक उपयुक्त है। क्योंकि न्यायपालिका ही इस क्षेत्र में अनुभव रखती है और दूसरा यदि कार्यपालिका पर उनके खुद के कृत्यों की वैधता का निर्णय करना छोड़ दिया जाये तो नागरिकों को दिये गये संवैधानिक तथा कानूनी संरक्षण अपने आप में भ्रमजाल हो जायेंगे। यदि एक न्यायाधीष गैर न्यायिक ढंग से कार्य करता हे तो इससे न्यायिक स्खलन होगा और पीड़ित व्यक्ति के मन में अन्यायबोध उभरेगा। अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत इस न्यायालय में विषेश अनुमति याचिका का उपचार भी महंगा तथा मना करने वाला और दूर दराज के लोगों के लिए, जो इस न्यायालय तक पहंुचना वहन नहीं कर सकते हैं ,अवरोध है ।

Friday, 20 May 2011

वैधता पर निर्णय


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ब्रह्म प्रकाष बनाम उत्तर प्रदेष राज्य में निर्णय दिनांक 07.02.06 में स्पश्ट किया है कि यह असंभव है कि सभी सांविधिक कानूनों को जाना जाय और सभी सामान्य नियमों का जानना असंभव है। लॉर्ड आटकिन ने कहा है कि यह कभी भी मान्यता नहीं रही कि प्रत्येक व्यक्ति कानून को जानता है नियम यह है कि कानूनी भूल क्षम्य नहीं है इसका प्रयोग एवं क्षेत्र अलग है।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने भंवरलाल बनाम मदनलाल (1988 (1) डब्ल्यू.एल.एन. 725) में स्पश्ट किया है कि संविधान का अनुच्छेद 141 यह उद्घाटित करता है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय भारतीय सीमा क्षेत्र के समस्त न्यायालयों पर बाध्यकारी है। यह ध्यान दिया जाने योग्य है कि मर्यादा कानून की अज्ञानतावष विधिक प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर लाने के आवेदन पत्र कृश्ण मोहन बनाम सुरपति बनर्जी एआईआर 1925 कल0 684, रामचन्द्र बनाम सभापति एआईआर 1928 मद्रास 404, मेहरसिंह बनाम सोहनसिंह एआईआर 1936 लाहौर 710 और अब्दुल लतीफ बनाम फजल अली में अनुमत किये गये थे। विधायिका ने भारतीय मर्यादा अधिनियम 1963 की धारा 5 के अन्तर्गत विलम्ब को क्षमा करने का प्रावधान किया है ताकि न्यायालय मामले का गुणावगुण के आधार पर निपटान कर सारभूत न्याय कर सके। विधायिका ने पर्याप्त कारण षब्द स्थापित कर पर्याप्त लोचषीलता दी है ताकि न्यायिक उद्देष्य पूर्ण हो सके व न्यायिक लक्ष्य जीवन्त रूप से पूर्ण करने में न्यायालय समर्थ हो सके। यह सुपरिचित है कि यह न्यायालय इसमें दायर मामले में न्यायोचित उदारता बरत रहा है। लेकिन खेद है कि यह संदेष पद सोपान में निचले स्तर के न्यायालयों तक नहंी पहुंच सका है।
सुप्रीम कोर्ट ने नेपक मिकोन लि. बनाम मैग्मा लिजिंग लि. (ए.आई.आर 1999 सु.को.1952) में कहा है कि इस न्यायालय का कर्त्तव्य है कि वह विधायिका के अभिप्रायः को मूर्तरूप देने के लिए अर्थ निकाले। अतः यदि विषेश रूप से, किसी दण्ड कानून में निर्माताओं द्वारा प्रयुक्त किसी षब्द का षाब्दिक अर्थ निकालने से विधायिका का उद्देष्य विफल होता है जिसे कि किसी दुश्कृत्य को दबाने के लिए रखा गया था तो न्यायालय षब्दकोश या लोकप्रिय अर्थ से हटकर ऐसा अर्थ लगा सकता है जिससे न्याय हेतुक अग्रसर होता है और दुश्कृति को दबाया जा सकता हो। प्रत्येक विधायन एक सामाजिक दस्तावेज है और न्यायिक अभिप्राय कानूनी मिषन का सही अर्थान्वयन करना है, भाशा जिससे हेडन मामले का प्रथम नियम कि बुराई को दबाना और उपचार को आगे बढाना है। न्यायालय ने धारित किया कि कानून का उद्देष्य ही संतुलन को मोड़ता है इसका सषक्त अभिप्राय दृश्कृति को टालकर जिसके लाईसेन्स से लोगों को उपचार और विषुद्ध लक्ष्य प्राप्ति है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि न्यायाधीष का पद ऐसा अभिप्राय निकालने के लिए है कि दुश्कृति दबे और उपचार आगे बढ़े व दुश्कृति के चालू रहने के प्रत्येक मार्ग दब जावे। एक अधिनियम के समस्त उद्देष्यों की प्रभावी पूर्ति के लिए इसे मना करने वाले या टालने वाले अप्रत्यक्ष या लम्बे मार्ग बनाने वाले प्रत्येक प्रयास को दबाने का अर्थान्वयन होना चाहिए। इनमें से एक यह है कि न्यायालयों को ध्यान रखना चाहिए कि वे कानून का अर्थ निकालते समय इतना संकीर्ण दृश्टिकोण नहीं अपनाये कि जो इसके दायरे में आते हैं वे बच निकल जाये। मकड़जाल रूपी वार्निष को साफ करो और लेनदेन को सही प्रकाष में दिखा दो।
सुप्रीम कोर्ट ने आषीर्वाद फिल्म्स बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 18.05.07 में कहा है कि करारोपण अब सरकार चलाने का खर्चा उगाहने का स्रोत मात्र नहीं है। यह है आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का स्वीकृत साधन है। एक श्रेणी के होटलों से भिन्न अन्य श्रेणी के होटलों पर भिन्न करारोपण का यह तर्कसंगत आधार है कि दोनों में अलग-अलग आर्थिक स्तर/श्रेश्ठता के लोग उपयोग करते हैं। करारोपण विधान का भी दण्ड विभाग की तरह कड़ाई से अर्थ निकाला जाना चाहिए। एक वर्गीकरण स्वैच्छाचारी, कृत्रिम या टालमटोलपूर्ण न होकर तर्क संगत, प्राकृतिक तथा जिन वर्गों पर लागू होता है उनकी प्रकृति के अनुसार सारभूत अंतर होना चाहिए।

Thursday, 19 May 2011

वैधता और पुराने कानून


इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने जे.बी. चोपड़ा बनाम भारत संघ (ए.आई.आर.1967 सु.को. 357) में धारित किया है कि यह अर्थ निकलता है कि प्रषासनिक ट्राईब्यूनल (अधिकरण) उच्च न्यायालय का स्थानापन्न है तथा आवष्यकीय क्षेत्राधिकार, षक्ति तथा अधिकार है कि सेवा सम्बन्धित मामलों में समस्त मामलों, यहां तक कि संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 (1), की वैधता या अन्यथा व्यवहृत कर विनिष्चय करने का है।
इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने एल.चन्द्रकुमार बनाम भारत संघ (ए.आई.आर. 1997 सु.को. 1125) में स्पश्ट किया है कि हमारे समक्ष यह तर्क रखा गया है कि जब विधायन की वैधता के प्रष्न का मुद्दा उठाया जाये तो ट्राईब्यूनल को उसका निर्णयन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और उन्हें मात्र उन मुद्दों तक सीमित रहना चाहिए जहां संवैधानिक मुद्दे नहीं उठाये जाते हैं। हम उक्त प्रस्ताव से सहमत नहीं है क्योंकि इससे कार्यवाही बंट जायेगी और परिहार्य विलम्ब होगा। यदि ऐसा दृश्टिकोण अपनाया गया तो विवाद्यकों के लिए संवैधानिक मुद्दे उठाना खुला रहेगा जिसमें से कुछ बिल्कुल बनावटी हो सकते हैं और वे सीधे उच्च न्यायालय जायेंगे व ट्राईब्यूनल के क्षेत्राधिकार का सत्यनाष कर देंगे। चूंकि इन विषाखाओं में भी कुछ संवैधानिक मामले नियमित रूप से उठते रहते हैं, उदाहरणार्थ सेवा सम्बन्धित मामलों में अनुच्छेद 14,15 और 16 की व्याख्या अंतर्वलित हो सकती है। यदि यह धारित किया जावे कि ट्राईब्यूनल को संवैधानिक मुद्दे व्यवहृत करने का कोई अधिकार नहीं है तो जिस उद्देष्य के लिए उनकी स्थापना हुई थी वही विफल हो जायेगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने इसी क्रम में प्रेम नारायण षर्मा बनाम राजस्थान राज्य (आर.एल.डब्ल्यू 2005 (4) राज 2916) में स्पश्ट किया है कि राजस्थान सि.से.अ. ट्राईब्यूनल को अनुच्छेद 14 तथा 16 (1) के उल्लंघन सहित समस्त प्रकरणों जिनमे संवैधानिकता या अन्यथा का मुद्दा षामिल है सहित सभी सेवा सम्बन्धित मामलों के निर्धारण का अधिकार है और यह प्रक्रियागत तकनीकियों के बहाने पर क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने से मना नहीं कर सकती। जब सारभूत न्याय और तकनीकियां आमने-सामने हो तो ट्राईब्यूनल को तकनीकियों को छोड़कर सारभूत न्याय देने में आगे आना चाहिए।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एयरसेल डिजीलिंक इंडिया लि. बनाम नगर निगम इलाहाबाद (2000 (1) ए.डब्ल्यू.सी. 562) में कहा है कि याची यह स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा है कि भवन की हालत ऐसी है जिस पर 60 फिट ऊँचा टॉवर छत पर बनाया जा सके, जो गिरेगा नहीं तथा वहां रहने व वहां से होकर गुजरने वाले लोगों के लिए खतरनाक साबित नहीं होगा। अतः हमारा विचार है कि निगम द्वारा जारी नोटिस न तो स्वैच्छाचारी है और न ही दुर्भावनावपूर्ण और न ही षक्तियों का रंगीन प्रयोग है।
सुप्रीम कोर्ट ने मिठू बनाम पंजाब राज्य (ए.आई.आर. 1983 473) में कहा है कि ऐसा लगता है कि उनके मानस में एक किस्म का मामला था कि आजीवन कारावास से दण्डित व्यक्ति द्वारा जेल अधिकारियों की हत्या करना। यह स्मरणीय है कि उन दिनांे में जेल अधिकारी प्रायः विदेषी -अधिकांष अंग्रेज होते थे और कुछ प्रावधान विषेशतः उनके अनुकूल बनाये जाते थे, न्यायिकगणों की पसंद के अनुसार धारा 303 देषीय जाति के लोगों द्वारा सफेद अधिकारियों पर हमले रोकने के लिए अधिनियमित की गयी थी। विधि आयोग की 42वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि इस धारा के अन्तर्गत मृत्यदण्ड का प्राथमिक उद्देष्य जेल के स्टाफ को सुरक्षा प्रदान करना है। एक आजीवन कारावासी को जेल के अन्य साथी द्वारा उसकी पत्नी के सतीत्व पर लांछन लगाकर गंभीर किन्तु अचानक नहीं या अचानक किन्तु गंभीर प्रकोपन किया जा सकता है, । यदि वह प्रकोपक की हत्या करता है तो धारा 303 के तहत एक मात्र दण्ड मृत्युदण्ड है। प्रष्न यह है कि क्या उसे न्यायालय को इस बात से संतुश्टि के अवसर से वंचित करना उचित है कि उसने हत्या का अपराध उसकी पत्नी की गंभीर मानहानि करने पर किया, अतः उसे मृत्यदण्ड नहीं दिया जाये। हमारे विचार से आजीवन कारावास से दण्डित व्यक्ति द्वारा जेल की चार दीवारी के भीतर हत्या करने के लिए मृत्यु दण्ड निर्धारित करना तर्कसंगतता के उत्तर में कठिन है। अब आजीवन कारावासित व्यक्ति द्वारा दूसरी श्रेणी के अपराध जिन्हें वह पैरोल या जमानत पर होकर करता है पर विचारण हेतु लिए जाते हैं। यदि आजीवन कारावासित व्यक्ति जमानत या पैरोल पर रिहाई होने पर पाता है कि उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर पड़ौसी ने उसकी पत्नी के साथ अनुचित सम्बन्ध स्थापित कर लिये हैं। यदि वह उन्हें आपतिजनक अवस्था में पाता है और बहलाने वाले की गोली मारकर हत्या कर देता है तो उसके हत्या के आरोप से बचने के पर्याप्त अवसर है क्योंकि प्रकोपन गंभीर एवं अचानक है।

Wednesday, 18 May 2011

प्रत्यायोजित विधायन


सुप्रीम कोर्ट ने ए.के. रॉय बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1986 सु.को.2160) में कहा है कि जहंा कहीं कोई षक्ति कुछ करने के लिए निष्चित तरीके से सौंपी जाती है तो वह उसी तरीके से किया जाना चाहिए अन्यथा बिल्कुल नहीं। निश्पादन के अन्य तरीकों की निष्चित रूप से मनाही है। धारा 20 (1) अधिनियमित करने का विधायिका का उद्देष्य अधिकारियों द्वारा निर्धारित तरीके से षक्ति प्रयुक्त करने के लिए था और अन्यथा नहीं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वी.डी. भास्कर बनाम महाप्रबन्धक उत्तर रेल्वे (1998 (3) ए.डब्ल्यू.सी. 2035) में कहा है कि परिणामस्वरूप ट्राईब्यूनल को अधिनस्थ विधायन एवं नियमों की वैधता जांचने की षक्ति होगी। फिर भी ट्राईब्यूनल की यह षक्ति एक महत्वपूर्ण अपवाद के अधीन होगी। ट्राईब्यूनल मूल कानून की वैधता का प्रष्न व्यवहृत नहीं करेगी इस सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए कि जिस कानून के अन्तर्गत ट्राईब्यूनल का गठन हुआ है उस कानून को ही असंवैधानिक नहीं ठहरा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य बनाम बसंत नाहटा प्रकरण के निर्णय दिनांक 07.09.05 में कहा है कि जब संविधान संसद या राज्य विधायिका को विधायन का कर्त्तव्य सौंपता है तो स्वगर्भित है कि यह दायित्व अन्य के कन्धे पर डालने से मना करता है। नागरिकों के अधिकारों से संव्यवहार करने वाला कानून स्पश्ट और साफ होना चाहिए। जहां कहीं भी जननीति की अवधारणा की व्याख्या करनी हो तो यह न्यायपालिका को करना है तथा इसकी भी न्यायपालिका की षक्ति अत्यन्त सीमित है। विधायिका के आवष्कीय कार्य आगे नहीं सौंपे जा सकते और संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 246 की स्पृषता में विनिष्चय किया जाना है। इस प्रकार केवल अनुशंगी और प्रक्रियागत षक्तियां ही सौंपी जा सकती है और आवष्कीय विधायी बिन्दु नहीं। यह तर्क भी गुणहीन है कि नीतिगत निर्णय में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा। विधायी नीति संवैधानिक समादेष के प्रावधानों से मेल खानी चाहिए। अन्यथा नीतिगत निर्णय भी न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एषोसियेटेड सीमेन्ट क.लि. बनाम पी.एन. षर्मा (1965 एआईआर 1595) में कहा है कि विषेश मामले और प्रष्न (ट्राईब्यूनल) उनको उन्हें निर्णयार्थ सौंपे जाते हैं और इस अर्थ में उनकी एक विषेशता न्यायालयों से मिलती है। न्यायालय और ट्राईब्यूनल सरकार द्वारा स्थापित किये जाते हैं और विषुद्धरूप से प्रषासनिक या कार्यपालकीय कार्यों से अलग न्यायिक कार्य से विनियोजित होते हैं। एक ट्राईब्यूनल होने के लिए आवष्यक है कि निर्णयन षक्ति कानून या कानूनी नियम से ली जानी चाहिए।

Tuesday, 17 May 2011

न्यायिक शक्तियों के आयाम


सुप्रीम कोर्ट ने पीरतिनम बनाम भारत संघ (1994 एआईआर 1844) में कहा है कि धारा 309 अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है, इसलिए निरर्थक है। यह कहा जा सकता है कि इस दृश्टि से मात्र मानवीकरण का हेतुक ही आगे नहीं बढ़ेगा अपितु जो समय की आवष्यकता है वो वैष्विक रूप से आगे बढेगी जिससे हम हमारे आपराधिक कानून को विष्व स्तर तक पहंुचा पायेंगे। दण्ड संहिता धारा 309 को असंवैधानिक है और इसलिए व्यर्थ घोशित कर याचिका अनुमत की जाती है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदिल बनाम उत्तर प्रदेष 19.04.08 राज्य में कहा है कि आपराधिक अन्वीक्षा कोई परियों की कहानी नहीं है कि जिसमें की कोई अपनी कल्पनाओं को आपस में लड़ाने के लिए खुला हो। इसका सम्बन्ध मात्र इस बात से है कि क्या अभियुक्त पर जो आरोप लगाया गया है वह इसका दोशी है। अपराध एक जीवन में वास्तविक घटना है जो भिन्न-भिन्न मानवीय भावनाओं का खेल है एक दोशी द्वारा अपराध किये जाने के निश्कर्श पर पहुंचने के लिए न्यायालय को साक्ष्य को इसकी संभावना, आंतरिक मूल्य और गवाहों की प्रवृति के मानदण्ड से निष्चय करना होता है। प्रत्येक मामला अपने अन्तिम विष्लेशण में खुद के तथ्यों पर निर्भर करता है। यद्यपि सभी तर्क संगत संदेह का लाभ अभियुक्त को मिलना चाहिए ठीक इसी समय न्यायालय को उन साक्ष्यों को खारिज नहीं करना चाहिये जो कि सामान्यतः विष्वसनीय है। इस गवाह अब्दुल हलीम का आचरण पूर्णतः अविष्वनीय है क्योंकि उसका आचरण मानव स्वभाव के विपरीत है। यदि अब्दुल हलीम ने पीड़ित और अभियुक्त को दिनांक 13.09.2000 को इन्तजार के गन्ने के खेत में जाते देखा तो उसे निष्चित रूप से यह तथ्य पीड़ित के पिता और भाई को बताना चाहिये था जब उन्होंने इसके लिए तलाष की और मस्जिद के लाउड स्पीकर से पीड़ित के गायब होने की घोशणा करवाई। अब्दुल हलीम द्वारा इस सूचना को प्रकट नहीं करना यह दर्षाता है कि जिस घटना का आरोप लगाया न तो वह हुई और न ही उसने इन्तजार के खेत में पीड़ित को ले जाते जैसा उसने कथन किया देखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने एन.बी. खरे बनाम दिल्ली राज्य (एआईआर 1950 सुको 211) में कहा है कि यदि कोई कानून किसी प्रजाजन की स्वतन्त्रता को किसी कार्यकारी अधिकारी चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो कि दया पर छोड़ता है और जिसका कार्य न्यायिक ट्रिब्यूनल द्वारा पुनरीक्षण के अधीन नहीं है वह कानून स्वैच्छाचारी है तथा कानूनी षक्तियांे का तर्कसंगत प्रयोग नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एषोसियषन बनाम भारत संघ के निर्णय दिनांक 06.10.1993 में कहा है कि चूंकि ऊपरी न्यायालयों में न्यायाधीषों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका ही सर्वोतम है ताकि उपलब्ध में से सर्वोतम के चयन का संवैधानिक कृत्य जो कि अधिक महत्वपूर्ण भूमिका पूर्ण की जा सके। जब राज्य न्यायिक सेवा के लिए चयन किया जाना हो तो इस बात पर सर्वाधिक ध्यान देने की आवष्यकता है कि सक्षम एवं योग्य व्यक्ति जिनमें उच्च स्तरीय ईमानदारी एवं निश्ठा हो का ही चयन किया जावे । यदि हमारे पास अच्छे ,सक्षम और ईमानदार न्यायाधीष नहीं हों तो राज्य की लोकतांत्रिक षासन व्यवस्था ही खतरे में पड़ जायेगी। यह हमेषा ध्यान देने योग्य है कि गैर मनमानापन जो कि विधिक षासन का आवष्यक लक्षण है पूरे संविधान में समाहित है और सम्पूर्ण षक्तियों का एक व्यक्ति में केन्द्रीयकरण का अभाव संविधान के किसी भी कृत्य के भाग के रूप में संलग्न सिद्धान्त है। विधि का षासन विवेकाधिकार को न्यूनतम और गैर मनमानेपन के लिए सुपरिचित दिषा निर्देष या सिद्धान्तों के अनुसार सीमित करता है यद्यपि विवेकाधिकार व्यावहारिक आवष्यकता है। प्रत्येक लोक अधिकारी में निहित षक्ति सार्वजनिक उद्देष्य की पूर्ति के लिए है और हित को बढ़ाने के लिए ही प्रयोग की जानी चाहिए। न्यायपालिका को अधिनायकवादी कार्यपालिकीय प्रकृति वाले लोगों से बचाने की आवष्यकता है, वे लोग जो संघर्श उत्पन्न करते है और टकराव को पनपाते है, व्यक्ति जो अपने हित के लिए सिद्धान्तों से समझौता करते हैं वे व्यक्ति जो न तो भूतकाल के इतिहासकार हैं और न ही भविश्य के पैगम्बर अपितु अल्पकालीन अस्तित्व में विष्वास करते हैं। अन्तर्निहित सीमा के अधीन आकाष के नीचे कोई भी विशय ऊपरी न्यायपालिका के लिए न्यायिक पुनर्विलेाकन हेतु खुला है। हम न्यायिक पुनर्विलोकन द्वारा न केवल कार्यपालकीय, प्रषासनिक या अर्द्ध न्यायिक कृत्यों को निरस्त करते हैं और जो हमें आक्रामक लगे उसे तोड़ते है फिर हमने इससे भी आगे बढ़कर कई मामलों दिषा निर्देष निर्धारित कर सकारात्मक कार्य भी किया है। यह कहा जाता है कि व्याख्या के माध्यम से न्यायलय नीति निर्माता है। सरकार द्वारा नीति निर्माण में इसका दृश्टिकोण महत्व रखता है।

Monday, 16 May 2011

संवैधानिकता


सुप्रीम कोर्ट ने बैंगलोर मेडीकल ट्रस्ट बनाम बी.एस. मुडप्पा (ए.आई.आर. 1991 सु.को. 1902) के मामले में स्पश्ट किया है जो कि कानून के उल्लंघन में षक्ति के प्रयोग को कानून में सुरक्षित रखी गयी सामान्य षक्तियों के संदर्भ में इसके प्रभावी एवं उचित ठहराव के लिए प्रयास नहीं किया जा सकता है। यह धारा सरकार को यह निर्देष जारी करने के लिए अधिकृत करती है कि कानूनी प्रावधानों की अनुपालना सुनिष्चित की जा सके न कि कानून के विपरीत कार्य करने के लिए सषक्त करती है। जो कार्य करने के लिए अधिनियम अनुमत नहीं करता उसे करने के लिए राज्य सरकार द्वारा वैध नहीं किया जा सकता। एक अवैधता मात्र इसलिए ठीक नहीं की जा सकती है क्योंकि यह सरकार ने की है। कानून से ऊपर कुछ भी नहीं है। लोकतन्त्र में कानून और नियम ही विद्यमान रहते हैं और षक्तियों के प्रयोग करने वाले व्यक्ति का कद नहीं। परिणामतः यह अपील निरस्त की जाती है और हम निर्देष देते है कि प्रत्यर्थीगण को सम्पूर्ण खर्चे दिये जावें।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भारत संघ बनाम श्रीमती किरण बाला षर्मा के निर्णय दिनांक 03.02.10 में कहा है कि ट्राईब्यूनल ने जवाहर लाल नेहरू विष्वविद्यालय के मामले पर निर्भर रहते हुए धारित किया है कि नौकरी में स्थानान्तरण एक सामान्य घटना है जिस पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता और प्रषासनिक आवष्यकता के आधार पर स्थानान्तरण में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता जब तक कि अधिकारी की ओर से दुर्भावना साबित न हो जावे। यह धारित किया गया कि दुर्भावनायें दो प्रकार की हो सकती है। पहली तथ्य की दुर्भावना तथा दूसरी कानूनी दुर्भावना। आगे यह धारित किया गया कि यदि एक स्थानान्तरण आदेष ऐसे तथ्यों से उद्भूत नहीं होता जिन पर स्थानान्तरण आधारित है और कुछ अन्य असंगत या दण्डात्मक प्रकृति के आधारों से उत्पन्न होता हो तो उसे प्रषासनिक आवष्यकता नहीं कहा जा सकता और ऐसा स्थानान्तरण आदेष दण्ड के स्थान पर है और निरस्त करने योग्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक राज्य बनाम विष्ववर्ती हाऊस बिल्डिंग कोऑपरेटिव सोसायटी (ए.आई.आर. 2003 सु.को. 1043) के प्रकरण में कहा है कि ये अर्द्धन्यायिक ट्राईब्यूनल है जिनका अस्तित्व उपभोक्ताओं को त्वरित व सस्ते में उपचार उपलब्ध कराने के लिए है। समान रूप से यह स्पश्ट है कि ये उपभोक्ता मंच/आयोग न्यायिक कार्य के पूरक है न कि प्रतिस्थापक । वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ताओं के मध्य विवादों के निपटान हेतु कम खर्चीली एवं त्वरित न्याय प्रणाली हेतु अतिरिक्त मंच उपलब्ध करवाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने नरोतम किषोर देव वर्मा बनाम भारत संघ(ए.आई.आर. 1964 सु.को. 1590)  के निर्णय में कहा है कि इस मामले को छोड़ने से पहले हम केन्द्र सरकार का ध्यान गंभीर रूप से आकर्शित करना चाहेंगे कि क्या धारा 87बी सिविल प्रक्रिया संहिता हमेषा के लिए जारी रखना आवष्यक है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारतीय राज्यों के राजाओं के साथ हुए करार को स्वीकार करना है और दिये गये विष्वास की अनुपालना करनी है। लेकिन कानून के समक्ष समानता के सिद्धान्त के आलोक में यह अजीब सा लगता है कि धारा 87बी हमेषा के लिए चलती रही। भूतकालीन लेन देनों और व्यवहारो के लिए भूतपूर्व भारतीय राज्य के राजाओं को न्यायोचित रूप से संरक्षण दिया जा सकता है लेकिन केन्द्र सरकार इस बात की जांच कर सकती है कि 26 जनवरी 1950 के बाद लेनदेनों को ऐसे संरक्षण की आवष्यकता है या चालू रहना चाहिए। यदि संविधान के अन्तर्गत सभी नागरिक समान हैं तो धारा 87 बी को भूतकालिक लेन देनों तक सीमित रखना वांछनीय है और इस विसंगति को सदा-सदा के लिए बाकी नागरिकों तथा राजाओं के बीच नहीं रखा जाना चाहिए। समय व्यतीत होने के साथ ही जिन ऐतिहासिक कारणों से धारा 87बी की वैधता घिस जायेगी और इस धारा का बाद में चालू रहना गंभीर चुनौती के लिए खुला होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने श्री कुमार प्रदम प्रसाद बनाम भारत संघ (1992 (2) एस.सी.सी. 428) में कहा है कि यदि एक व्यक्ति को राश्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा भी संवैधानिक पद पर नियुक्त किया गया है तो अधिकारपृच्छा कार्यवाही में उस व्यक्ति के वह पद धारण करने में योग्यता को जांचा जा सकता है और नियुक्ति निरस्त की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर जनरल टेªडर्स बनाम आंध्रप्रदेष राज्य (1984 ए.आई.आर.121) में कहा है कि समय विधायन के पक्ष में नहीं चलता यदि यह अधिकारों से बाहर है तो भी वकीलों द्वारा लम्बे समय से अवैधता स्थापित करने में असफलता से भी इसे कोई षक्ति प्राप्त नहीं होती। इन सभी मामलो में यह सही है कि किसी भी प्रावधान को अवैध नहीं ठहराने से जो स्थिति एक कानून में गैर विभेदकारी थी समय व्यतीत होने से विभेदकारी बन गई है और संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन में इसको सफलतापूर्वक चुनौती दी जा सकती है।
मध्य प्रदेष उच्च न्यायालय ने ठाकुर भरतसिंह बनाम मध्यप्रदेेष राज्य (ए.आई.आर. 1964 म0प्र0 1757) में कहा है कि यह निर्णय स्पश्ट करता है कि राज्य की कार्यकारी षक्तियां सिर्फ उन मामलों तक सीमित नहीं है जिन पर कानून बनाये जा चुके हैं। बल्कि यह उन मामलों तक विस्तृत है जिन पर कानून बनाने के लिए राज्य विधायिका सक्षम है और कार्यकारी अधिकारी संविधान या किसी कानून के विपरीत किसी षक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने डालमिया (1959 एससीआर 279) में कहा है कि हमेषा से यह मान्यता है कि कानून को संवैधानिक माना जाता है  और यह दायित्व उस व्यक्ति पर है जो यह कहता है कि यह स्पश्टतः संवैधानिक सिद्धान्तों का अतिक्रमण है और यह माना जाता है कि विधायिका अपने लोगों की आवष्यकताओं को अच्छी तरह से समझती और मूल्यांकन करती है और इसके कानून अनुभव द्वारा सामने आयी समस्याओं की ओर निर्देषित होते हैं तथा भेदभाव पर्याप्त आधारों पर निर्धारित होते हैं।

Sunday, 15 May 2011

वकीलों का आचरण


वकीलों के सम्बन्ध में:ः-
सुप्रीम कोर्ट ने हरिषंकर रस्तोगी बनाम गिरधारी षर्मा (ए.आई.आर. 1978 सु0को0 1019) में स्पश्ट किया है कि एक व्यक्ति जो वकील नहीं है अधिकार के रूप न्यायालय में पैरवी नहीं कर सकता तथा एक पक्षकार की ओर से बहस करने का दावा नहीं कर सकता। उसे न्यायालय से पूर्व अनुमति लेनी ही चाहिए जिसका प्रस्ताव स्वयं पक्षकार द्वारा आना चाहिए। न्यायालय के विवेकाधिकार में है कि वह अनुमति दे या रोके। वास्तव में न्यायालय अनुमति को बीच में भी वापिस ले सकता है यदि प्रतिनिधि दोशी साबित होता है । चरित्र, सम्बन्ध, निजी व्यक्ति को सेवाएं लेने के कारण और बहुत सी अन्य परिस्थितियांे पर अनुमति देने या मना करने से पूर्व विचार किया जाना चाहिए। प्रस्तुत मामले में मैंने देखा है कि वे दोनों आपसी विष्वास से साथ-साथ आये हैं। मुझे भी निजी व्यक्तियों के संगठनों पर दिषाहीन पक्षकार के षोशण पर संदेह करना चाहिए था किन्तु संदेह किसी निश्कर्श का आधार नहीं होना चाहिए। अतः जो पक्षकार अपना मामला स्वयं प्रस्तुत करने में असमर्थ है उसे अपनी व्यथा मित्र के माध्यम से कहने की अनुमति देना ठीक रहेगा। जो टिप्पणियां तैयार कर रखी है उन्हें देखने से लगता है वह मित्र कानून से परिचित है यद्यपि मूर्ख मित्र दुर्भाग्यपूर्ण हो सकते हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने डी.पी.चढ्ढा बनाम त्रिपुरी नारायण मिश्रा (2001 (2) एस.सी.सी. 221) में कहा है कि कर्त्तव्य निर्वहन में पारस्परिक सद्विष्वास और बार तथा बेंच के मध्य मधुर सम्बन्ध रथ को सौहार्दपूर्ण गति प्रदान करते है। जैसा कि उन्हें न्यायालय के जिम्मेदार अधिकारी कहा जाता वे न्याय के उचित प्रषासन में न्यायालय की न्यायोचित सहायता करने का दायित्व निभाते हैं। एक वकील को निर्विवादित और न्यायपालिका को सही कानूनी सिथति बताने के साथ स्वीकार करने में झिझक नहीं होनी चाहिए। एक वकील न्यायालय का अधिकारी होने के नाते न्यायाधीष केा कानून की सही स्थिति बतायेगा चाहे वह किसी भी पक्षकार के पक्ष में या विरूद्ध में हो।
सुप्रीम कोर्ट ने एम.वाई. षरीफ बनाम नागपुर उच्च न्यायालय के न्यायाधीष (1995 ए.आई.आर. 19) के मामले में कहा है कि यह घोशणा सार्वजनिक रूप से की जानी चाहिए कि ऐसे वकील जो तर्कसंगत रूप से स्वयं को संतुश्ट किये बिना यदि न्यायालय को बदनाम करने वाले आवेदन पत्र हस्ताक्षरित करते हैं या न्याय के रास्ते केा अवरूद्ध  करने या विलम्ब करने वाला कार्य करते हैं तो अवमान के दोशी हैं और वकील का ऐसे आवेदन पत्र हस्ताक्षरित करने का कोई कर्त्तव्य नहीं है। अपितु अपने मुवक्किल को ऐसा करने से मना करने की सूचना देनी चाहिए। एक मर्यादित क्षमायाचना इस न्यायालय द्वारा विचार की जाती है।
इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने के.ए. मोहम्मद अली बनाम सी.एन. प्रसन्न (ए.आई.आर.1995 सु.को. 454) में कहा है कि यह सभी को स्मरण रखना चाहिए कि वकील न्यायालयों के लिए बनाये जाते हैं न कि न्यायालय वकीलों के लिए।
पटना उच्च न्यायालय ने (एआईआर 1986 पटना 65 में ) कहा है कि हम न्यायाधीष तथा बार (वकील) न्यायालय के दो पांव है और हम सभी जो कि पूर्ण बेंच का निर्माण करते है और विपक्षी पहले से ही बार के सदस्य है।

Saturday, 14 May 2011

लोक सेवक से अपेक्षाएं

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