Monday, 28 February 2011

पुलिस अत्याचार के लिए कठोर दंड


पुलिस थाने के भीतर जुगताराम का गुप्तांग काटे जाने  के प्रमुख प्रकरण  में निचले न्यायालय द्वारा सुनाये गये निर्णय  में  अपील में राजस्थान उ न्या ने दो दोषियों को दोषमुक्त कम कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट ने अपील के निर्णय  में केन्द्रीय अ ब्यू बनाम किशोरसिंह में निर्णय दि 25-10-10 में कहा है कि  एक पुलिस थाने के भीतर आहत तथा पुलिस वालों के अतिरिक्त अन्य गवाह का होना मुश्किल  से ही सम्भव है। एक पुलिस थाना कोई सार्वजनिक स्थल या सार्वजनिक सड़क नहीं है जहां लोग देख सकें कि क्या होने जा रहा है। वह एक क्षतिग्रस्त साक्षी है और सामान्यतः न्यायालय क्षतिग्रस्त व्यक्ति के साक्ष्य को अधिक महत्त्व देता है। फिर भी हम यह विश्वास करने में कठिनाई पाते हैं कि पुलिस थाने में जो कुछ हो रहा हो उससे थाना प्रभारी होते हुए वह अनभिज्ञ हो और हमें जुगताराम पर अविश्वास  करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। यह एक नृशंस  कृत्य था जिसके लिए अभियुक्त किसी उदारता की पात्रता नहीं रखता। पुलिसवाले जो आपराधिक कृत्य करते है वे ऐसे कृत्य करने वाले अन्य लोगों से बड़े दण्ड के पात्र है क्योंकि पुलिस का कर्त्तव्य लोगों की रक्षा करना है और अपने आप कानून तोड़ना नहीं। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए तो सभ्य समाज का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। दोनों दोषमुक्त दोषियों की सजा पुनः कायम कर दी गयी ।
(

Sunday, 27 February 2011

लोक सेवकों के अनुचित कृत्यों के विरुद्ध अपील एवं दांडिक कार्यवाही

आयुक्त के पद पर कार्य करते हुए पटे जारी करने की षिकायतों की जांच में दोशी   पाये गये गोविन्द मेनन (अपीलार्थी )  के विरूद्ध अनुषासनिक कार्यवाही के प्रकरण में केरल उच्च न्यायालय ने कार्यवाही पर रोक लगाने से मना कर दिया था । आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील में गोविन्द मेनन (अपीलार्थी ) बनाम भारत संघ (ए.आई.आर 1967 स.न्या. 1274) के प्रकरण में निर्णय में कहा है कि   इस आषय का आरोप है कि आयुक्त के रूप में षक्तियों का प्रयोग करते हुए अपीलार्थी ने षक्तियों का दुरूपयोग किया और ऐसे दुराचरण के सम्बन्ध में उसके विरूद्ध कार्यवाही की गयी। इस प्रकार स्पश्ट है कि पट्टे की स्वीकृति का औचित्य एवं वैधता यद्यपि अधिनियम के अन्तर्गत अपील या पुनरीक्षण में उठाई जा सकती है और यदि इस बात के प्रमाण हैं कि आयुक्त ने अपने कर्Ÿाव्यों के निवर्हन में अविचारित ढंग से कार्य किया या  ईमानदारी या सद्विष्वास से कार्य करने में विफल रहा या वैधानिक षक्तियों के प्रयोजन में निर्धारित षर्तों की अनुपालना नहीं की है तो सरकार अनुषासनिक कार्यवाही अलग से कर सकती  है । अपील निरस्त कर दी गयी । अभिप्रायः यह है कि दुराचरणयुक्त अवैध कृत्य के विरूद्ध अपील या पुनरीक्षण के साथ- साथ दाण्डिक कार्यवाही भी की जा सकती है।            ( फॉण्ट परिवर्तन से हुई वर्तनी समबन्धित अशुद्धियों के लिए खाद है )               

Saturday, 26 February 2011

संवैधानिक दायित्व


दिल्ली उ. न्या. ने सांसदों द्वारा प्रष्न पूछने के बदले धन लिए जाने  के प्रमुख प्रकरण अनिरूद्ध बहल बनाम राज्य में निर्णय दि. 24.09.10 में कहा है कि

सजग एवं सतर्क रहते हुए राश्ट्र की आवष्यकताओं एवं अपेक्षाओं के अनुसार दिन-रात रक्षा की जानी चाहिए और उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रश्टाचार को उजागर करना चाहिए। अनुच्छेद 51 क (छ) के अन्तर्गत जांच-पड़ताल एवं सुधार की भावना विकसित करना नागरिक का कर्Ÿाव्य है। अनुच्छेद 51 क (झ) के अन्तर्गत समस्त क्षेत्रों में उत्कर्शटता के लिए अथक प्रयास करना प्रत्येक नागरिक का कर्Ÿाव्य है ताकि राश्ट्र आगे बढे। प्रत्येक नागरिक को भ्रश्टाचार मुक्त समाज के लिए भरसक प्रयास करना चाहिए और भ्रश्टाचार को उजागर करना चाहिए और राज्य प्रबन्धन में समस्त  विषेशतः उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रश्टाचार को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
स्वच्छ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और अन्य अंग पाना नागरिकों का मूलभूत अधिकार है और इस मूलभूत अधिकार को प्राप्त करने के लिए जहां भी भ्रश्टाचार पाया जावे उसे उजागर करना प्रत्येक नागरिक का कर्Ÿाव्य है और यदि संभव हो तो सप्रमाण उजागर करे ताकि राज्य तन्त्र यदि कार्य नहीं करे और भ्रश्ट लोगों के विरूद्ध कार्यवाही नहीं करे तो उपयुक्त समय आने पर लोग अपने प्रतिनिधियों को नकार कर कार्यवाही कर सकें अथवा जन-जागृति के माध्यम से उनके विरूद्ध कार्यवाही के लिए राज्य को विवष कर सकें।
सŸाासीन लोगों के विरूद्ध षिकायतों पर केन्द्रीय अन्वेशण ब्यूरो और पुलिस किस प्रकार कार्यवाही करती है कहने की आवष्यकता नहीं है । सीटी बजाने वालों का हश्र इस राश्ट्र के लोग देख चुके हैं, उन्हें परेषान किया जाता है अथवा मार दिया जाता है अथवा आपराधिक प्रकरणों में बांध दिया जाता है। यदि भ्रश्टाचार ध्यान में आ जावे तो भी पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में रूचि नहीं रखती। यदि पुलिस वास्तव में रूचिबद्ध होती तो दूरदर्षन चैनलों पर टेप गूजंने के बाद ठीक अगले दिन ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर सकती थी। पुलिस ने, बड़ी संख्या में सांसदांे के नाम टेप में दिखायी दिए उनको छोड़ते हुए, मात्र माध्यस्थ लोगों और याची तथा एक दो अन्यों के विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की और सत्तासीन व्यक्तियों के लिए ‘स्वामी भक्त’ की  की तरह कार्य किया है ।
स्मरण रहे कि उक्त प्रकरण में स्वयं स्ंिटग ऑपरेषन करने वालों के विरुध पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया था जबकि सांसदों के विरुध पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की। दिल्ली उ. न्यायालय ने स्ंिटग ऑपरेषन करने वाले प्राथर््िायों के विरुध दर्ज प्रकरण को निरस्त कर दिया।               

Friday, 25 February 2011

लोक सेवकों का दांडिक दायित्व


एक मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट मानना है कि व्यक्ति की असावधानी, जानबूझकर की गयी दुता या दुराशय से किये गये अपराध से ी अधिक हानिकारक और दुष्परिणामदायक हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि एक सतंरी असावधानी बरतता है और चौकी पर ड्यूटी पर रहते सो जाता है तो यह शत्रु को चौकी के अन्दर आने अनुमति प्रदान करने के समान है। इसी प्रकार से रेलवे केबिन मेन द्वारा असावधानी बरतते हुए ट्रेेक (पटरी) पर खड़ी ट्रेनको नजरअन्दाज करके दूसरी ट्रेन को उसी ट्रेक पर आने का संकेत देने से दो ट्रेनों में आमने-सामने की  िड़न्त का होना। नर्स द्वारा मांसपेशियों के मध्य दिए जाने वाले इजेंक्शन का नसों में दिया जाना, जिससे तुरन्त मृत्यु हो जाना। पायलॉट द्वारा हवाई जहाज में खराबी इंगित करने वाले उपकरण की अनदेखी करना और वायुयान दुर्घटना से जीवन की भारी क्षति होना आदि असावधानी की सुपरिचित घटनाएं हैं जो अक्षम्य हैं। ( भारत संघ बनाम जे. अहम्मद ए. आई. आर. 1979 सु. को. 1022)
कानून अपराधियों को अपराधों के अन्वेशण तथा अभियोजन सहित उनके जीवन  स्तर के अनुसार विभेदक व्यवहार हेतु वर्गीकृत नहीं करता है। एक समान अपराध के करने पर प्रत्येक व्यक्ति कानून के अनुसार समान रूप से व्यवहृत किया जाना है जो कि प्रत्येक के लिए समान रूप से लागू है। लोक-पदधारी अपने निर्णयों एवं कृत्यों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह हैं और उन्हें उनके पद की जो छानबीन उचित हो उसके लिए प्रस्तुत रहना चाहिए। लोक-पदधारियों को जो भी वे निर्णय लेते हैं और कार्यवाही करते हैं, के प्रति यथासम्भव  खुला होना चाहिए। उन्हें अपने निर्णयों हेतु कारण देने चाहिए और मात्र वे सूचनाएं प्रतिबन्धित करनी चाहिए जिनके लिए व्यापक लोक हित स्पश्ट मांग करता हो। यह सर्वविदित है कि लोक-पदधारियों को मात्र लोक हित में प्रयोजन हेतु कतिपय षक्तियां न्यासित की जाती हैं और इसलिए उनके द्वारा यह पद जनता के न्यासी के रूप में धारित किया जाता है। उनमें से किसी द्वारा इस सदाचार के पथ से कोई भी भटकाव न्यास भंग बन जाता है और दरी के नीचे दबाये जाने की बजाय इस पर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए।
(विनीत नारायण नामोपरि भारत संघ ए.आई.आर. 1998 स. न्या 889)

Thursday, 24 February 2011

जानें कानून -001


उŸार प्रदेश राज्य परिवहन निगम के परिचालक सुरेश चन्द शर्मा पर आरोप था कि उसने यात्रियों से रोडवेज बस यात्रा का किराया तो वसूला, लेकिन टिकिट नहीं काटे और किराये की राशि अपनी जेब में रख ली। इस मामले में परिवहन निगम ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया। परिचालक ने ट्रिब्यूनल में अपील की। ट्रिब्यूनल ने  बर्खास्तगी की सजा को ज्यों की त्यों बहाल रखा, लेकिन इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील पेश करने पर हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी की सजा के आदेश को निरस्त कर दिया। जिसके विरुद्ध परिवहन निगम की अपील पर निर्णय सुनाते हुए देश की सर्वोच्चत अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निर्णय को उलटते हुए कहा कि हाई कोर्ट का यह दायित्व है कि वह ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित तथ्यों को उलटते समय केवल कारण ही नहीं, बल्कि असरदार कारणों का उल्लेख करे। यदि हाई कोर्ट का निर्णय असरकारी कारणों से सहीतरह से समर्थित नहीं है तो ऐसा निर्णय अपने आप ही दूषित है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्त में परिचालक की प्राथमिक सजा को बरकरार रखते हुए कहा है कि  भ्रश्टाचार /दुर्विनियोग के दोषी के लिये सेवा से बर्खास्तगी ही एक मात्र दण्ड है। (उŸार प्रदेश राज्य परिवहन निगम बनाम सुरेश चन्द शर्मा दि. 26.05.10)


सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी भी संस्थान या तंत्र की सद्भावनापूर्ण आलोचना उस संस्थान या तंत्र के प्रशासन को अन्दर झांकने और अपनी लोक-छवि में निखार हेतु उत्प्रेरित करती है। न्यायालय इस स्थिति की अवधारणा पसंद नहीं करते कि उनकी कार्यप्रणाली में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं है। किन्तु यह स्पश्ट करना आवश्यक है कि जो कुछ न्यायालयों में या न्यायालयों द्वारा किया जा रहा है, उसके प्रति असम्मति व्यक्त करने से यद्यपि कानून नहीं रोकता है, फिर भी न्यायपालिका पर भ्रश्टाचार के निराधार आरोप लगाना, अभिव्यक्ति व्यक्ति की स्वतंत्रता की भ्रान्त अनुज्ञा नहीं हो सकती। मुक्त भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरूपयोग है और अवमानना कानून के समीप ले जाता है।
(एम.आर.पाराशर बनाम डॉ. फारूक अब्दुल्ला-1984 क्रि. ला. रि. (सु. को.)113)

Wednesday, 23 February 2011

जनता के आईने में भारतीय न्यायपालिका -3

राज्य ने इस प्रकार न्यायिक क्षेत्र मंे हस्तक्षेप कर अनुच्छेद 50 की भावना के विपरीत कार्य किया है। यद्यपि संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालयों को सभी न्यायालयों व अधिकरणों पर पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण के अधिकार देता है किन्तु उच्च न्यायालयों द्वारा अधिकरणों से कोई प्रतिवेदन तक नहीं मांगे जाते और न ही उनमें नियुक्तियों एवं स्थानान्तरण में उच्च न्यायालयों की कोई प्रषासनिक भूमिका रहती है। अधीनस्थ अधिकरणों व न्यायालयों द्वारा भेजे जाने वाले आवधिक प्रतिवेदन भी मात्र एक रिक्त औपचारिकता है तथा इनमें असंतोशजनक गुणात्मक एवं गणात्मक स्थिति परिलक्षित होने पर भी कोई सम्यक या समुचित कार्यवाही नहीं की जाती। एक द्विसदस्यीय अधिकरण द्वारा पूरे वर्श भर में 4 प्रकरणों का निपटान करने पर भी पद सोपान में उच्च अधिकरण द्वारा कोई निवारक कार्यवाही नहीं की गयी। सरकार का यह दावा कि अनुभवी व विषेशज्ञों द्वारा सस्ते तथा त्वरित न्याय हेतु अधिकरणों का गठन किया जाता है खोखला प्रतीत होता है जब 90 दिन की निर्धारित अवधि में निर्णित होने वाले प्रकरण 5 वर्श से लम्बित हैं।
न्यायाधीषों के दुराचरण एवं अक्षमता की षिकायतों पर कार्यवाही करना सामान्यतः आवष्यक नहीं समझा जाता है क्यांेकि संविधान में न्यायपालिका का षासन के किसी अंग के प्रति दायित्व रेखांकित नहीं किया गया है। इससे न्यायिक आचरण स्वच्छन्द एवं नियन्त्रणहीन होने का जोखिम है। सामान्यतः संगीन आरोप लगाये जाने तक न्यायिक अधिकारियों पर कार्यवाही हेतु न्यायप्रषासन प्रतीक्षा करता है। अतः सामान्यतः दुराचरण पर कार्यवाही नहीं होने से न्यायाधीष दुस्साहसी हो जाते है। अन्ततोगत्वा कुछ गंभीर आरोपों वाले न्यायाधीषों को सेवामुक्त कर प्रकरण का संक्षिप्त पटाक्षेप कर दिया जाता है। विचाणीय प्रष्न है कि क्या ये न्यायाधीष रातों-रात या एक चरण में ही इतने अधिक दुस्साहसी हो गये अथवा इनके विरूद्ध आने वाले छोटी षिकायतों पर कार्यवाही न होने के कारण से इनका उत्साहवर्द्धन हुआ। इस दिषा में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उ.प्र.न्या. अधिकारी संघ के प्रकरण में किसी भी न्यायाधीष के विरूद्ध मुख्य न्यायाधीष की पूर्वानुमति के बिना कोई भी आपराधिक प्रकरण दर्ज करने पर रोक लगाकर अलौकिक किन्तु संविधान विरोधी कार्य कर दिया है। इस निर्णय ने अब किसी भी न्यायिक अधिकारी के दुराचार के विरूद्ध जनता को उपचार का मार्ग बन्द कर दिया है किन्तु नया वैकल्पिक मार्ग भी प्रदान नहीं किया है।यद्यपि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने षोशित रेल्वे कर्मचारी  के  प्रकरण में कहा है कि असमानता चाहे हैसियत, अवसर या सुविधा की हो समाप्त होनी चाहिए, विषेशाधिकार का अन्त होना चाहिए और षोशण भागना चाहिए । जनतन्त्र में जनमत ही संप्रभु्, सर्वोच्च एवं सर्वश्रेश्ठ निर्णायक है। इंग्लैण्ड में इस गंभीर एवं चुनौतीपूर्ण समस्या से निपटने के लिए संवैधानिक सुधार अधिनियम 2005 द्वारा न्यायाधीषों का दायित्व निर्धारण का प्रावधान रखा गया है। अमेरिका एवं पाष्चात्य देषों में लोक-सेवकों को हमारी तरह दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 197 जैसे संरक्षण का प्रावधान नहीं है। संरक्षण की आवष्यकता  राजसता में भागीदार को  नहीं अपितु अषक्त को  है । कहा भी गया है कानून कमजोर को पीस देता है व ताकतवर उसके ऊपर षासन करता है । पाष्चात्य देषों में न्यायाधीषों के विरूद्ध षिकायतों, उनकी सार्वजनिक प्रताड़ना, अषंकालिक नियुक्ति आदि के विधिवत् प्रावधान हैं।
हमारे यहां न्यायिक दृश्टान्तों के माध्यम से संवैधानिक न्यायालयों द्वारा सुस्थापित सिद्धान्तों की स्वयं उनकी रजिस्ट्री द्वारा अवहेलना की जाती है। न्यायाधीष में कुषाग्रबुद्धि, न्यायप्रिय विक्रमादित्य की छवि देखने वाली जनता को यद्यपि न्यायालयों से राजनीति, षासन-प्रषासन के षुद्धिकरण की उच्च अपेक्षाएं है किन्तु यक्ष प्रष्न यह है कि जो न्यायालय अपनी स्वयं की स्वच्छन्द व नियन्त्रणहीन रजिस्ट्री का षुद्धिकरण करने में विफल  हैं वह षासन के अन्य अंगों के षुद्धिकरण की जनता की अपेक्षाओं तक कितना खरा उतर सकेंगे। दिनांक 23.12.2006 को हुई उच्च न्यायालयों के महारजिस्ट्रारों एवं राज्य विधि सचिवों की संयुक्त विचारगोश्ठी में विचार व्यक्त किया गया था कि सतर्कता प्रकोश्ठ न्यायालय स्टाफ पर प्रभावी नियंत्रण रखेगा और उनकी गतिविधियों का नियमित अनुश्रवण करेगा ताकि जनता की नजर में न्यायालयों की छवि धूमिल न हो। पीठासीन अधिकारी को प्रकरणों में पेषी निरपवाद रूप से स्वयं को ही देनी चाहिए और प्रक्रिया व प्रणाली को इस प्रकार प्रवाहित करना चाहिए ताकि स्टाफ सदस्यों का विवादकों के साथ न्यूनतम सम्पर्क हो।  सर्वोच्च न्यायालय ने भी तारक सिंह के प्रकरण में कहा है कि हमें स्मरण रखना चाहिए बाहरी तूफान की तुलना में अन्दरूनी कठफोड़ों से अधिक भय है। अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय स्टाफ से टाईपिस्ट कार्य लेना भी एक छद्म भ्रश्टाचार एवं घुसपैठ है ।
देष को (अरून्धतिराय के प्रकरण में) दिवालिया राजनीति से ग्रसित बताने वाला हमारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय आम नागरिक (नगरपालिका कमेटी, पटियाला) के प्रकरण में विधायिका को सर्वोच्च बताते हुए हस्तक्षेप से मना कर सकता है किन्तु न्यायाधीषों की परिलब्धियों व सुविधाओं में वृद्धि के (ऑल इंडिया जजेज) प्रकरण में विधायिका को निर्देष देना अपने क्षेत्राधिकार में मानता है।हमारे यहां व्यावहारिक रूप में फिर भी प्रक्रियागत जटिलताओं को वरीयता दी जाती है। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डाक माध्यम से प्रेशित प्रलेखों को स्वीकार किया जाता है। हमारे यहां अर्द्ध-न्यायिक या कार्यपालक न्यायालयों द्वारा तो डाक से प्राप्त प्रलेखों का संज्ञान लिया जाता है किन्तु न्यायिक न्यायालयों में डाक से प्राप्त प्रलेखों पर सामान्यतः कार्यवाही नहीं की जाती है। यद्यपि स्वयं न्यायालय नागरिकों को डाक द्वारा प्रेशित समन या नोटिस को उचित तामिल विषेशाधिकार मानते हैं। इस प्रकार नागरिकों के द्वारा प्रेशण एवं नागरिकों को न्यायालय द्वारा प्रेशण में भिन्न-भिन्न मानदण्ड की अनुचित कार्यसंस्कृति एवं षैली द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पश्ट उल्लंघन किया जा रहा है।
वर्तमान न्याय-प्रणाली में पुलिस द्वारा नागरिकों पर की जा रही ज्यादतियों एवं अत्याचारों के विरूद्ध भी कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। यदि कोई न्यायाधीष पुलिस ज्यादती से पीड़ित  हो तो न्यायाधीषों को कागजी चीता बताते हुए भी दोशी पर हर प्रकार के संभव दंड-अनुषासनिक, दांिण्डक, अवमान-अधिरोपित किए जा सकते हैं किन्तु आम नागरिक के पीड़ित होने पर मात्र राजकोश से क्षतिपूर्ति दिलवाकर कर्Ÿाव्य की प्रायः इतिश्री कर ली जाती है। स्मरणीय है कि कल्याणकारी लोकतान्त्रिक राज्य अपने नागरिकों के विरूद्ध किसी संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता है। जब जनता को अपनी सुरक्षा का विष्वास हो तो वह सत्य व न्याय की मदद के लिए आगे अवष्य आयेगी क्योंकि भयभीत व्यक्ति सत्य नहीं बोल सकता । न्यायालयों द्वारा जनता का विष्वास जीतने की आवष्यकता है। हमें खाकी मिश्रित ष्याम आतंकवाद से दूर रहना है।
न्यायतन्त्र से जुडे. लोगाों का विष्वास है कि यदि समय पर वास्तविक न्याय दिया जाने लगा तो तुच्छ  मामले भी आने लगेंगे क्योंकि वर्तमान में अतिपीड़ित ही पहुंच रहे हैं । अन्तिम उपचार के रूप में नागरिक न्यायालयों में इसलिए आते हैं कि वर्तमान व्यवस्था में इसका कोई विकल्प नहीं है। संचार, बैंकिग आदि सेवाओं के वैष्वीकरण के बाद राज्य क्षेत्रीय सेवा प्रदाताओं की हिस्सेदारी घटी है। दायित्व सहित निजी न्यायतन्त्र  दायित्वहीन राज्य न्यायतन्त्र का अच्छा विकल्प हो सकता है। न्यायतन्त्र द्वारा अनुचित विलम्ब, उत्पीड़न के लिए, सरकार द्वारा नागरिकों को  पर्याप्त प्रतिपूर्ति स्वतः दी जानी चाहिए जिसे दोशी अधिकारी से वसूल करना राज्य का विषेशाधिकार हो सकता है। यदि चिकित्सकीय लापरवाही जिम्मेदारी का कारण बन सकती है तो न्यायिक लापरवाही इसका अपवाद कैसे हो सकती है। न्यायिक कार्यवाही भी अलौकिक न होकर संविधान की परिधि में समान लौकिक कार्यवाही ही है।

( फॉण्ट परिवर्तन से हुई वर्तनी संबंधित अशुद्धियों के लिए खेद है )

Tuesday, 22 February 2011

जनता के आईने में भारतीय न्यायपालिका -2

यायिक, अर्द्धन्यायिक या कार्यपालक न्यायाधीषों की कार्यषैली, चरित्र और गुणधर्म में मुष्किल से ही कोई अन्तर हो सकता है अपितु न्यायिक न्यायालयों की कार्यवाही अधिक जटिल एवं लम्बी होने के कारण विलम्बकारी अवष्य होती है। एक जिले के न्यादर्ष आँकड़ों से प्रकट होता है कि वर्श भर में दोशसिद्ध होने वाले प्रकरण उस वर्श में दर्ज प्रथम सूचना प्रतिवेदनों का मात्र 1.5 प्रतिषत हैं ,षेश 98.5 प्रतिषत का अभियोजन के नाम अनुचित उत्पीड़न होता है। अन्य जिलों की स्थिति भी कमोबेष इसी स्तर के समकक्ष प्रतीत होती है। इस प्रसंग में प्रायः विधि तन्त्र से जुडे़ लोग कुतर्कों का सहारा लेकर बचाव करते देखेसुने जा सकते है। उनके अनुसार झूठी प्रथम सूचनाएं दर्ज करवाना, न्यायालय की मदद हेतु जनता का आगे न आना, पक्षकारों में समझौता होना आदि कारणों से दोश सिद्धियां नहीं हो पाती हैं। वास्तविक स्थिति यह है कि झूठे अभियोग दर्ज करवाने पर धारा 182, 211 व क्षतिपूर्ति आदि के प्रावधान हैं जिनका उपयोग कर ऐसी मनोवृति को बदला जा सकता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के क्षतिपूर्ति के प्रावधान का उपयोग भी यदाकदा होता है। न्याय तन्त्र में जनता के विष्वास में कमी होने के कारण ही मदद हेतु आगे न आना, समझौता होना आदि परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं। अधिकांष आपराधिक मामलों में न्यायाधीषों द्वारा तकनीकी आधार गढ़कर अभियुक्त को दोशमुक्त कर दिया जाता है किन्तु ऐसा करने में प्रायः यह स्पश्ट नहीं किया जाता कि आरोपित धारा के अपराध का कौनसा घटक-भाग पूर्ण नहीं होता है। दूसरी ओर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 76 से 95 तक में दोश सिद्धि के सीमित अपवाद वर्णित हैैं फिर भी न्यायाधीष इस लक्ष्मण रेखा से परे जाकर स्वरचित अपवादों के आधार पर दोशमुक्त कर देते हैैैं।
न्यायालयों द्वारा दिए गए अनुकरणीय निर्णय भी उपलब्ध हैं किन्तु इनकी संख्या नगण्य है तथा वे भी किसी भावावेष में आकर किसी अज्ञात या अपवित्र कारण से प्रभावित प्रतीत होते हैं। नाम-मात्र के अपवादिक अच्छे निर्णयों से आम नागरिक का कल्याण नहीं हो सकता। यदि वास्तव में अच्छे निर्णय दिए जाए तो वादकरण स्वतः कम हो जायेगा। किन्तु अधिकांष निर्णय तुश्टीकरण पर आधारित लोकप्रियता उन्मुख नीति का अनुसरण कर दिए जाते हैं। जनता की अपेक्षा है आपवादिक उदाहरणों को छोड़कर सभी न्यायिक निर्णय अनुकरणीय हो।
आज देष में सिविल प्रकृति के वाद अत्यन्त सीमित रह गये है। न्याय-तन्त्र से जुडे़ लोगों का रात-दिन अपराधियों से वास्ता पड़ता रहता है व उनके द्वारा अपनायी जाने वाली तकनीक, क्रिया विधि से वे सभी परिचित होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में न्याय-तन्त्र से जुडे़ लोगों- पुलिस, अधिवक्ता व न्यायाधीष- की मनोवृति आपराधिक होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्रभावी नैतिक व आध्यात्मिक षिक्षा और सुसंस्कार ही एकमात्र इसकी रोकथाम हो सकती है। न्याय का उद्गम स्त्रोत अंतरात्मा है, ज्ञान नहीं। इंग्लैण्ड के लॉर्ड चांसलर के अनुसार न्यायाधीष होने के लिए भला व्यक्ति होना आवष्यक है तथा कानूनी ज्ञान एक अतिरिक्त गुण है।
विगत तीन दषकों से जनहित याचिका के नाम पर न्यायपालिका का महिमामडंन कर इसे एक सामाजिक न्याय का नवोन्मेशी साधन बताया जा रहा है जबकि व्यवहार प्रक्रिया संहिता की धारा 91 में इसके समानान्तर प्रावधान निचले स्तर तक के न्यायालयों के लिए सन् 1908 से विद्यमान हैं। हमारी जटिल न्यायिक प्रक्रिया मात्र न्यायतन्त्र से जुडे़ लोगों के लिए स्वर्ग के समान है तथा इसके प्रत्येक सरलीकरण का वे प्रत्यक्ष एवं परोक्ष विरोध करते हैं। वास्तविक न्यायोन्मुख सरलीकरण के किसी भी कदम को उनका हार्दिक समर्थन प्राप्त नहीं होता है। त्वरित निर्णय हेतु वर्श 1999 व 2002 में व्यवहार प्रक्रिया संहिता में किए गए संषोधनों का अधिवक्तागणों द्वारा राश्ट्रव्यापी विरोध किया गया और अंततः सलेम बार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका भी दायर की गयी। इस याचिका के निर्णय में त्वरित निस्तारण हेतु  प्रकरण प्रवाह प्रबन्धन नियम बनाये जाने की अनुषंसा की गयी। किन्तु स्वयं सर्वोच्च न्यायालय तथा अधिकंाष उच्च न्यायालयों ने स्वानुषासन के लिए ऐसे नियम आज तक नहीं बनाये हैं। कुछ उच्च न्यायालयों ने जो अनमने मन से नियम बनाये हैं उनमें मौलिक बातों के समावेष का अभाव है। इससे अधिक दुखद पहलू यह है कि इन नियमों की भी व्यवहार में अनुपालना नहीं हो रही है। दाण्डिक नियमों के अनुसार दाण्डिक याचिका पर तुरन्त कार्यालय रिपोर्ट होकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जानी चाहिए किन्तु व्यवहार में एक सप्ताह तक का समय लगना सामान्य बात है। प्रकरणों के निपटान में लगने वाला औसत 15 वर्श का समय भी चिन्ताजनक है। सरकारी सेवाओं के बदले मांगा जाने वाला समस्त प्रकार का कर, उपकर, षुल्क आदि भुगतान करने वाली जनता को समय पर न्याय दिया जाना चाहिए । लोक अदालत प्रणाली भी न्यायतंत्र का कोई विजय-स्तम्भ नहीं है बल्कि न्याय-तंत्र द्वारा संविधान सम्मत न्याय देने में विफलता की उपज है। प्रायः कमजोर पक्ष के हित की बलि से ही समझौते सम्पन्न होते हैं क्योंकि जिनके पास प्रचुर संसाधन हैं वे न्याय प्रवाह को अपनी सुविधानुसार प्रवाहित करने में सफल हो जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक प्रकरण (ललिता कुमारी) में कहा है कि पक्षकार के व्यवहार कुषल होने पर कार्यवाही सुपरसोनिक जेट की गति से प्रगति करती है।

हमारे न्यायालयों के पास प्रमुख कार्य गिरफ्तारी एवं जमानत से सम्बन्धित है। सर्वोच्च न्यायालय ने जितेन्द्र कुमार बनाम उŸारप्रदेष राज्य के मामले में यह सिद्धान्त प्रतिपादित कर रखा है कि जघन्य अपराध के अतिरिक्त गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए किन्तु छोटे-मोटे अपराधों में भी पुलिस द्वारा गिरफ्तारी करना आम बात है और न्यायाधीष ऐसी गिरफ्तारी का मौन रहकर वैधानिकरण करते रहते हैं। 1.3 करोड़ की आबादी एवं 43 न्यायाधीषों वाले दिल्ली राज्य के उच्च न्यायालय में वर्श 2009 में 2517 जमानत याचिकाएं प्रस्तुत हुई जबकि 7 करोड़ की आबादी एवं 30 न्यायाधीषों के राजस्थान राज्य के उच्च न्यायालय में समान अवधि में 17225 जमानत याचिकाएं प्रस्तुत हुई। इन आकंड़ों से स्पश्ट है कि राजस्थान राज्य में सदोश परिरोध (अनावष्यक गिरफ्तारियां) अधिक होने के साथ-साथ अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा अधिक प्रकरणों में जमानत से इन्कार भी किया जाता है। गिरफ्तारी एवं जमानत की परिहार्य कार्यवाही मंे जन समय व संसाधनांे का अनावष्यक अपव्यय होने से न्यायालयों को प्रकरणों के वास्तविक निस्तारण हेतु कम समय उपलब्ध होना भी दुखद पहलू है। न्यायालयी निर्णय प्रक्रियागत न्याय तो हो सकतें है किन्तु सभी को वास्तविक न्याय की परिधि में मानना कठिन हैं। 
न्यायाधीष सामान्यतः न्याय सदन में 2-3 घन्टे प्रतिदिन बैठक करते हैं। औसत भारतीय की आय से लगभग 15 गुणा से भी अधिक वेतनमान न्यायाधीषों को इसलिए दिया जाता है कि वे पूरे नियत समय में न्यायालय में बैठें तथा निर्णय लेखन, छानबीन जैसा कार्य गृह-कार्य के रूप में करेंगे। इस हेतु उन्हें इन्टरनेट एवं लेपटॉप की सुविधाएं भी उपलब्ध करवायी गयी हैं किन्तु इस सभी व्ययभार से जनता को मिलने वाला लाभ जनता के हृदय-तराजू में तोला जा सकता है।
हमारे संविधान के अनुच्छेद 50 में न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त होने की आदर्ष स्थिति का उल्लेख है, किन्तु षनैः षनैः विभिन्न बोर्डांे, अधिकरणों, आयुक्तालयों आदि अर्द्धन्यायिक निकायों का गठन कर न्यायिक न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में कटौती कर दी गयी है। जो प्रकरण पूर्व में न्यायिक न्यायालयों द्वारा अन्वीक्षणीय थे अब अन्य अधिकरणों के क्षेत्राधिकार में है। इस प्रकार न्यायिक एवं कार्यपालक न्यायालयों के मध्य विभाजक रेखा अत्यन्त क्षीण व धुंधली हो गयी। आज स्थिति यह है कि देष में कुल न्यायिक कार्य का 50ः से अधिक भाग इन अधिकरणों द्वारा सम्पन्न किया जा रहा है जिनका वास्तव में कोई पर्यवेक्षण या अधीक्षण उच्च न्यायालयों द्वारा नहीं किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इन अधिकरणों में पदस्थापना, स्थानान्तरण आदि सरकारों द्वारा किये जाने के कारण ये संविधान की भावना के अनुरूप कार्यपालिकीय नियन्त्रण से मुक्त भी नहीं हैै।            


(फॉण्ट परिवर्तन से हुई वर्तनी सम्बंधित अशुद्धियों के लिए खेद है )

Monday, 21 February 2011

जनता के आईने में भारतीय न्यायपालिका -1

मृच्छकटिका के अंक 9 ष्लोक 5 में कहा गया है कि न्यायाधीष सम्पूर्ण विधि संहिता से परिचित, छल का पता लगाने में दक्ष व वाकपटु होना चाहिए। उसे कभी भी मिजाज नहीं बिगाड़ना चाहिए और सम्बन्धियों, मित्रों या अपरिचितों के प्रति निश्पक्ष होना चाहिए। उसके निर्णय वास्तविक घटनाओं के परीक्षण पर आधारित होने चाहिए। उसकी नैतिकता उच्च होनी चाहिए व लालच के प्रभाव में नहीं आना चाहिए, उसे दुश्टांे के हृदय में भय उत्पन्न करने व अषक्तजनों की रक्षा करने हेतु पर्याप्त सषक्त होना चाहिए। उसका मानस हर संभव तरीके से अधिकतम सत्य का अन्वेशण करने में संलग्न होना चाहिए।
संचार जगत में न्यायतंत्र के विशय मंे विधिवेताओं एवं न्यायाधिपŸिायों के विचार समय-समय पर प्रकट होते रहते है किन्तु उनमें लोकतान्त्रिक दृश्टिकोण का अभाव प्रायः अखरता है। इन प्रकट विचारांे में प्रायः आम जनता के अन्तर्मन की पीड़ाओं की अभिव्यक्ति का अभाव पाया जाता है। इस लेख के माध्यम से न्यायतंत्र के विशय में बिना किसी पूर्वाग्रह के जन दृश्टिकोण अभिव्यक्त करने का हार्दिक प्रयास कर रहा हूं। उच्चतम न्यायालय के आंकडों के अनुसार वर्श 2009 में क्रमषः मद्रास, उडी़सा एवं गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीषों ने 5005, 4583, एवं 3746 प्रकरण प्रति न्यायाधीष से प्रकरणों का निपटारा किया है जबकि भारत के समस्त उच्च न्यायालयों का आलोच्य अवधि में प्रति न्यायाधीष औसत मात्र 2537 प्रकरण रहा है। दूसरी ओर क्रमषः उŸाराखण्ड, दिल्ली और गौहाटी उच्च न्यायालयों का आलोच्य अवधि में यह औसत 1140, 1258 एवं 1301 आता है।
वहीं उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णित मामलों का उच्चतम न्यायालय में पहुंचने के अनुपात के दृश्टिकोण से स्थिति अग्रानुसार है। क्रमषः दिल्ली, पंजाब व उŸाराखण्ड उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णित मामलों के 8.6 प्रतिषत 7.1 प्रतिषत एवं 6.3 प्रतिषत प्रकरण इनके क्षेत्र से उच्चतम न्यायालय पहुंचे हैं जबकि समस्त भारतीय उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णित प्रकरणों के 2.5 प्रतिषत प्रकरण औसतन उच्चतम न्यायालय पहुंचे हैं। तथ्यों से स्पश्ट है कि दिल्ली एवं उŸाराखण्ड उच्च न्यायालय प्रति न्यायाधीष कम प्रकरण निपटाने के साथ-साथ अधिक आनुपातिक प्रकरण उच्चतम न्यायालय में पहंुचने वाले उच्च न्यायालय है। इन उच्च न्यायालयों में निस्तारण का गुणात्मक एवं गणात्मक दोनों पहलू चिन्ताजनक है। दूसरी ओर मद्रास, उड़ीसा एवं गुजरात उच्च न्यायालय अधिक निस्तारण के साथ-साथ कम प्रकरण उच्चतम न्यायालय पहुंचने वाले उच्च न्यायालयों में से है। इन उच्च न्यायालयों का कार्य अनुकरणीय हो सकता है। आलोच्य अवधि में क्रमषः उड़ीसा, जम्मू-कष्मीर एवं मद्रास उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णित प्रकरणों का मात्र 0.6 प्रतिषत, 0.7 प्रतिषत एवं 0.8 प्रतिषत प्रकरण इस क्षेत्र से उच्चतम न्यायालय पहुंचे है।
सम्पूर्ण भारतवर्श के उच्च न्यायालयों के औसत निश्पादन के आधार पर वर्श में दायर कुल 1779482 प्रकरणों के लिए 701 न्यायाधीषों की समस्त उच्च न्यायालयों में आवष्यकता है। तद्नुसार क्रमषः दिल्ली, गौहाटी एवं पंजाब में 24, 13 और 8 न्यायाधीष अधिषेश हैं जबकि दूसरी ओर मद्रास, कर्नाटक एवं उडी़सा में क्रमषः 45, 25 और 20 न्यायाधीषों की कमी है। सर्वोŸाम निस्तारण के आधार पर क्रमषः बम्बई, दिल्ली एवं इलाहबाद उच्च न्यायालयों में 35, 33 एवं 28 न्यायाधीष अधिषेश रहें है। जबकि मात्र उड़ीसा उच्च न्यायालय में 2 न्यायाधीषों की कमी है। इस प्रकार समस्त उच्च न्यायालयों में कुल 272 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिन्हें बकाया मामलों के निस्तारण में संलग्न किया जा सकता है।अधिनस्थ न्यायालयों में भी केरल, मद्रास एवं पंजाब के न्यायाधीषों ने आलोच्य अवधि में प्रति न्यायाधीष क्रमषः 2575, 1842 एवं 1575 प्रकरणों का निस्तारण किया है जबकि समस्त भारतीय न्यायाधीषों का यह औसत 1142 प्रकरण है। बिहार, झारखण्ड एवं उडी़सा के अधीनस्थ न्यायाधीषों का यह औसत क्रमषः 284, 285 एवं 525 है। दूसरी ओर आलोच्य अवधि में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा निर्णित प्रकरणों का उच्च न्यायालय पहुंचने का अनुपात क्रमषः उडी़सा, बिहार और हिमाचल प्रदेष से 39.1 प्रतिषत, 27.4 प्रतिषत और 25.1 प्रतिषत रहा जो कि देष के औसत 11.1 प्रतिषत से अधिक है। बिहार, उड़ीसा एवं झारखण्ड के अधीनस्थ न्यायालयों का प्रति न्यायाधीष कम निस्तारण होते हुए भी अधिक अनुपातिक भाग उच्च न्यायालय पहुंचा है। इन अधीनस्थ न्यायालयों का निस्तारण भी गुणात्मक व गणात्मक दोनों दृश्टिकोणों से चिन्ताजनक है। दूसरी ओर क्रमषः गुजरात, उŸाराखण्ड एवं केरल के अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा निर्णित मामलों का मात्र 5.4 प्रतिषत, 6.2 प्रतिषत एवं 7.6 प्रतिषत ही उच्च न्यायालयों तक पहुंचा है। केरल एवं गुजरात के अधीनस्थ न्यायालयों की स्थिति गुणात्मक एवं गणात्मक दोनों दृश्टिकोण से सुदृढ़ है।
समस्त भारत के अधीनस्थ न्यायालयों के औसत निपटान की दृश्टि से वर्श में दायर कुल 16965198 प्रकरणों के लिए कुल 14856 न्यायाधीषों की अधीनस्थ न्यायालयों में आवष्यकता है। इस दृश्टिकोण से क्रमषः बिहार, झारखण्ड एवं महाराश्ट्र में 747, 298 एवं 264 अधीनस्थ न्यायाधीष अधिषेश हैं तथा इसी प्रकार उŸारप्रदेष, तमिलनाडू एवं केरल के अधीनस्थ न्यायालयों में क्रमषः 610, 571 एवं 543 न्यायाधीषों की कमी है। सर्वोŸाम निस्तारण के आधार पर क्रमषः महाराश्ट्र, बिहार एवं उŸारप्रदेष के अधीनस्थ न्यायालयों में 1136, 923 एवं 805 न्यायाधीष अधिषेश हैं जबकि मात्र केरल के अधीनस्थ न्यायालयों में 7 न्यायाधीषों का अभाव है। सर्वोŸाम निस्तारण के आधार पर समस्त भारतीय अधीनस्थ न्यायालयों में 7507 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिनका उपयोग बकाया मामलों के निपटान में किया जा सकता है। विडम्बना यह है कि सम्पूर्ण देष में एक समान मौलिक कानून-संविधान, व्यवहार प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य अधिनियम व दण्ड संहिता- के उपरान्त न्यायालयों द्वारा अपनायी जाने वाली मनमानी व स्वंभू प्रक्रिया व परम्पराओं के कारण निस्तारण में गंभीर अन्तर है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सोमप्रकाष के  प्रकरण में कहा है कि प्रत्येक विवेकाधिकार गैरकानूनी मांग प्रेरित करता है। देष के उच्चतम न्यायालय को समस्त न्यायालयों पर पर्यवेक्षण, अधीक्षण एवं नियन्त्रण का अधिकार प्राप्त हैं किन्तु उक्त चिन्ताजनक परिस्थितियों के बावजूद मौन है। स्मरण रहे जन कल्याण की प्रोन्नति ही सर्वोच्च कानून है।
उच्च न्यायालयों में प्रति न्यायाधीष प्रतिवर्श निर्णित प्रकरणों की संख्या 284 से लेकर 2575 तक है वहीं अधीनस्थ न्यायालयों में प्रति न्यायाधीष यह संख्या 1140 से  3736 तक है। ठीक इसी प्रकार उच्चतर स्तर पर प्रस्तुत होने वाले प्रकरणों का प्रतिषत अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा निर्णित प्रकरणों की दषा में 5.4 प्रतिषत से लेकर 39.1 प्रतिषत तक है व उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णित प्रकरणों की स्थिति में 0.7 प्रतिषत से 8.6 प्रतिषत तक है। यह असहनीय विचलन 4 से 12 गुणा तक आता है।
                                                         
भारत में अधिकांष राज्यों में न्यायालयों एवं न्यायाधीषों के पद सृजन हेतु कोई ठोस सैद्धान्तिक नीति-पत्र नहीं है। अतः सुस्पश्ट नीति के अभाव में न्यायाधीषों एवं राजनेताओं को मनमानी करने का अवसर उपलब्ध है। न्याय-विभाग भारत सरकार के अनुसार यद्यपि न्यायाधीषों की पदस्थापना औसत वादकरण एवं बकाया के आधार पर की जाती है किन्तु उक्त वस्तुस्थिति से सरकार का दावा प्रथम दृश्टया खोखला प्रतीत होता है। न्यायालयों द्वारा प्रकरणों में उठने वाले सभी विवाद्यक बिन्दुओं का प्रायः निर्धारण ही नहीं किया जाता है परिणामतः उŸारोतर अपील के लिए संभावना के द्वार खुले रहते हैं व मुकदमेबाजी रक्तबीज की तरह वृद्धि करती है। इस प्रकार न्यायालयों में बढते कार्यभार का प्रमुख कारण गुणवताहीन निस्तारण है जिससे न तो आहत को पर्याप्त राहत मिलती है और न ही दोशी को इतना पर्याप्त दण्ड मिलता है कि जिसे देखकर विधि का उल्लंघन करने को लालायित अन्य लोग हतोत्साहित हो सकें। वैसे भी हमारी न्याय व्यवस्था में खर्चे व क्षतिपूर्ति के कोई मानक निष्चित नहीं है जिससे मनमानी का अवसर मिलता है। प्रत्यायोजित षक्तियों से बाहर जाकर न्यायाधीषों द्वारा दुस्साहसपूर्ण ढंग से कार्यवाहियां करने तथा बिना विधिक प्रावधान के संदर्भ के दण्डात्मक खर्चे अधिरोपित करने और वरिश्ठ न्यायालयों द्वारा पुश्टि जैसे दुखद उदाहरणों का भी अभाव नहीं है। दैवीय कार्य करने वाले संवैधानिक न्यायालयों द्वारा एक ही प्रकरण (भ्रश्टाचार निर्मूलन संगठन) में रू0 25000/- से लेकर रू0 40,00,000/- तक खर्चे व क्षतिपूर्ति मूल्यांकन किया जाना भारतीय न्यायपालिका के लिए आष्चर्यजनक तथ्य नहीं है।


( फॉण्ट परिवर्तन से हुई वर्तनी सम्बंधित अशुद्धियों के लिए खेद है )

Sunday, 20 February 2011

न्यायाधीशों की कमी- एक मिथक

उच्चतम न्यायालय के आंकडों के अनुसार वर्श 2009 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीषों ने 5005 प्रकरण प्रति न्यायाधीष से प्रकरणों का निपटारा किया है जबकि भारत के समस्त उच्च न्यायालयों का इसी अवधि में प्रति न्यायाधीष औसत मात्र 2537 प्रकरण रहा है।इस प्रकार समस्त उच्च न्यायालयों में कुल 272 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिन्हें बकाया मामलों के निस्तारण में संलग्न किया जा सकता है।अधिनस्थ न्यायालयों में भी केरल  के न्यायाधीषों ने वर्श 2009 में प्रति न्यायाधीष 2575 प्रकरणों का निस्तारण किया है जबकि समस्त भारतीय न्यायाधीषों का यह औसत 1142 प्रकरण है।  सर्वोŸाम निस्तारण के आधार पर समस्त भारतीय अधीनस्थ न्यायालयों में 7507 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिनका उपयोग बकाया मामलों के निपटान में किया जा सकता है। भारत में न्यायालयों एवं न्यायाधीषों के पद सृजन हेतु कोई ठोस सैद्धान्तिक नीति-पत्र नहीं है। अतः सुस्पश्ट नीति के अभाव में मनमानी करने का अवसर उपलब्ध है। विडम्बना यह है कि सम्पूर्ण देष में एक समान मौलिक कानून-संविधान, व्यवहार प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य अधिनियम व दण्ड संहिता- के उपरान्त न्यायालयों द्वारा अपनायी जाने वाली मनमानी व स्वंभू प्रक्रिया व परम्पराओं के कारण निस्तारण में गंभीर अन्तर है। देष की सरकारें और न्यायपालिका जनता को गुमराह मात्र कर रही हैं । 

(फॉण्ट परिवर्तन से हुई वर्तनी सम्बंधित अशुद्धियों के लिए खेद है )